दिल्ली के राजपथ पर गणतंत्र दिवस के मौके पर दुनिया ने भारत की शक्ति, शौर्य, संस्कृति के संगम को देखा। इस साल देश के 12 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियों को दिखाया गया था। इसके अलावा केंद्र सरकार के 9 मंत्रालयों की भी झांकी शामिल थी। हर झांकी अपने आप में खास थी, लेकिन थीम से यह साफ था कि इस बार संस्कृति, आजादी के आंदोलन और राज्यों के प्रतीकों को खास महत्व दिया गया है। इसी कड़ी में जम्मू-कश्मीर की झांकी भी अहम थी, जिसने बदले जम्मू-कश्मीर का नजारा दुनिया के सामने पेश किया। शंकराचार्य, मार्तण्ड सूर्य मंदिर और खीर भवानी मंदिरों से सजी झांकी ने दिखाया कि कैसे जम्मू-कश्मीर में प्राचीन काल से ही हिंदू संस्कृति विद्यमान रही है और राज्य में हमेशा विविधता का सम्मान किया गया है।

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जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर देखा जाता है, जिसका पहला हिस्सा जम्मू मंदिरों के शहर के तौर पर विख्यात है। इसके अलावा कश्मीर को झीलों, वादियों के लिए जाना जाता है। लेकिन कश्मीर का शैव परंपरा से भी जुड़ाव का अपना इतिहास रहा है, जिसे झांकी में बखूबी जगह दी गई। मार्तंड सूर्य मंदिर, नारंग, माता खीर भवानी मंदिर और शंकराचार्य की झलक दिखाकर यह बताने की कोशिश की गई कि कश्मीर में भी भारतीय संस्कृति उतनी ही प्राचीन है, जितनी देश के अन्य हिस्सों में है। झांकी के शुरुआती हिस्से में माता वैष्णो देवी मंदिर को दिखाया गया है, जो जम्मू डिविजन में है। 

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इसके अलावा पिछले हिस्से में आईआईटी, आईआईएम, एम्स और एयरपोर्ट को दिखाया गया है। इससे साफ संकेत देने का प्रयास किया गया कि कैसे जम्मू-कश्मीर में प्राचीन भारतीय संस्कृति का संगम देखने को मिलता है और आज वह प्राचीनता के साथ विकास की नवीनता को भी अपना रहा है। इस झांकी में जम्मू-कश्मीर के फोक म्यूजिक को भी दिखाया गया और काजीगुंड बनिहाल सुरंग के जरिए यह भी बताने का प्रयास किया गया कि विकास के नए मानक कैसे गढ़े जा रहे हैं। इस सुरंग ने जम्मू और कश्मीर की दूरी को 2 से 3 घंटे तक कम करने का काम किया है।



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