देहरादून: कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है और यह सच भी है. उत्तराखंड की राजनीति में को ही ले लीजिये. यहां कई बार इतिहास ने खुद को दोहराया है. जब-जब बीजेपी ने अपनी ही सरकार में सत्ता परिवर्तन किया है तब-तब एक ऐसे चेहरे को आगे लेकर आई जिसकी सम्भावना नहीं के बराबर रही थी. अब भी सत्ता के इस परिवर्तन में ऐसा ही हुआ. तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने यह साबित कर दिया है कि उनका निर्णय सत्ता बाजार के भाव से बिलकुल अलग होता है.

दरअसल, जब पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री बदलने के लिए अंदरखाने एक अभियान शुरू हुआ तो त्रिवेंद्र के उत्तराधिकारी के तौर पर जो नाम लिए जा रहे थे उनमें से किसी को भी मौका नहीं मिला. जिनका नाम दौड़ में था उनमें केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, नैनीताल से लोकसभा सांसद अजय भट्ट, महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, राज्यमंत्री धनसिंह रावत, बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी समेत तमाम दिग्गज शामिल थे.

जिनकी उम्मीद थी उनका नंबर कट गया

कई राज्यों में चुनाव और अन्य बड़ी जिम्मेदारी के चलते पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बलूनी को दिल्ली में ही रोक लिया. निशंक का पत्ता इसलिए कट गया क्योंकि वो जब मुख्यमंत्री थे कई विवादों के चलते उन्हें बीच में हटाना पड़ा था. अजय भट्ट के नाम पर मंथन हुआ लेकिन निर्णय नहीं हो सका. कोश्यारी का उम्रदराज होना और सतपाल महाराज का मूलत: बीजेपी का नहीं होना मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी की राह में रोड़ा बन गया, धनसिंह रावत का नाम इसलिए कट गया… एक तो वो त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में कनिष्ठम सदस्य थे और दूसरा यह खबरें आ रही थी कि त्रिवेंद्र कैंप उन्हें मुख्यमंत्री बनवाने के लिए अड़ा है, इसलिए उनका भी पत्ता साफ़ हो गया. पूरी छंटनी होने के बाद बदली परिस्थितियों में हाई कमान ने तीरथ सिंह रावत को मौका देकर सबको हैरान कर दिया.

इससे पहले भी जब बीजेपी 2007 का चुनाव जीती तो उस समय प्रबल दावेदार भगत सिंह कोश्यारी थे. लेकिन तत्कालीन पौड़ी सांसद बीसी खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बना दिया गया. उसके बाद जब खंडूड़ी को हटाया गया तो भगत को बनना था लेकिन खंडूरी अड़ गए और निशंक मुख्यमंत्री बन गए. यही स्थिति अब हुई, जिनकी उम्मीद थी उनका नंबर कट गया.

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