कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर के चलते खपत में कमी की आशंका के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने लगी हैं। इस बीच स्वेज नहर एक तेल कंटेनर के फंसने से जहाजों की आवाजाही रुक गई है। इससे कच्चे तेल के दाम में और कमी की आशंका है।
स्वेज नहर में क्यों अटका जहाज
समुद्र में आने वाली ऊंचे लहरों (हाई टाइड) की वजह से मंगलवार को स्वेज नहर में बड़ी मात्रा में गाद जमा हो गई। इससे एक 400 मीटर लंबा विशालकाय कंटेनर फंस गया। उसकी वजह से स्वेज नहर में कंटेनर की आवाजाही रुक गई है। हाई टाइड के तेज प्रभाव की वजह से इसे समय रहते नहीं हटाया जा सका है। इसके अलावा स्वेज नहर प्रशासन के पास तत्कालिक रूप से ऐसी क्रेन मौजूद नहीं थी जिससे इसे तुरंत हटाया जा सके।
दाम एक हफ्ते तक लगे रहने की आशंका
स्वेज नहर से जाम हटाने के लिए गुरुवार को तीसरे दिन भी कोशिशें जारी रहीं। इसके लिए पांच शक्तिशाली क्रेन लगाई गई हैं। लेकिन हाई टाइड की वजह से इसमें परेशानी आ रही है। स्वेज नहर प्रशासन ने बयान जारी कर कहा है कि जाम कब हटेगा इसको लेकर तुरंत कुछ कहना जल्दबाजी होगी। इसमें एक हफ्ते भी लग सकते हैं।
वैश्विक कारोबार पर इस अवरोध का असर
दुनिया के कुल कारोबार का 12 फीसदी स्वेज नहर के जरिये होता है। रोजाना 50व विशालकाय जहाज इस नहर के जरिये जाते हैं। इसके कुल यातायात में 49.8 फीसदी हिस्सेदारी कंटेरन की है। जबकि 28.2 फीसदी हिस्सेदारी तेल एवं गैस टैंकर की है। वहीं 16.1 फीसदी विशालकाय जहाज और 3.8 फीसदी वाहनों को ढोने वाले कंटेनर होते हैं।
भारत के लिए सस्ता कच्चा तेल कितना अहम
अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 80 फीसदी आयात करता है। भारत के कुल आयात खर्च में करीब एक तिहाई योगदान कच्चे तेल का होता है। डॉलर के भाव में एक रुपये तेजी आने पर भारतीय तेल कंपनियों को करीब 8000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ता है। इसके अलावा देश में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि होती है। विशेषज्ञों के अनुसार पेट्रोलियम उत्पादों में 10 फीसदी इजाफा होने पर महंगाई करीब 0.8 फीसदी बढ़ जाती है। ऐसे में सस्ता कच्चा तेल भारत के लिए फायदेमंद जबकि महंगाई तेल परेशानी का सबब है।
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