पूर्वी लद्दाख में चीन से लगती भारतीय सीमा पर बीते पांच महीनों से स्थिति तनावपूर्ण है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति को बिगाड़ने की चीन की हरसंभव कोशिश जारी है। मगर भारतीय सेना की मुस्तैदी उसके मंसूबे को कामयाब नहीं होने दे रही। बीजिंग लद्दाख में वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा यानी एलएसी की अवधारणा पर नवंबर 1959 के अपने रुख को मानता है और वह इसे बार-बार दोहरा रहा है। इस बीच राष्ट्रीय सुरक्षा योजनाकारों का मानना है कि चीनी सेना इस 1959 के दावे वाले प्रस्ताव का इस्तेमाल पश्चिमी क्षेत्र के मतभेद वाले छह अन्य इलाकों पर दबाव बनाने के लिए कर सकती है, जो दोनों देशों के बीच चल रहे गतिरोध में अब तक प्रभावित नहीं हुए हैं।
इस मामले से परिचित लोगों ने कहा कि भारतीय सेना को इस स्थिति के मूल्यांकन के लिए सतर्क कर दिया गया है और वह चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के किसी भी कदम से पहले अलर्ट पर है। चीन अगर अन्य छह इलाकों में 1959 के दावे के आधार पर कोई कार्रवाई करता है, तो भारतीय सेना उसके लिए पूरी तरह से तैयार है। दरअसल, चीन 7 नवंबर, 1959 को अपने तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भेजे गए एक पत्र में प्रस्तावित की गई एलएसी को मानता है।
विशेषज्ञ स्तर के समूह द्वारा पश्चिमी क्षेत्र के स्पष्टीकरण और पुष्टि के अनिर्णायक अभ्यास के दौरान यह पाया गया कि भारत और चीन के बीच महत्वपूर्ण क्षेत्रों के साथ मतभेद वाले 12 क्षेत्र थे। 17 जून, 2002 को पश्चिमी क्षेत्र के नक्शे का आदान-प्रदान किया जाना था, लेकिन अंतिम समय में चीन ने अपना कदम वापस ले लिया। यहां गौर करने की बात ये है भारत और चीन के बीच 2002 के बाद नक्शे की कोई अदला-बदली नहीं हुई है।
चीन पर नजर रखने वालों के विशेषज्ञों के अनुसार, मतभेदों वाले 12 विवादित क्षेत्रों में से 6 पर पहले से ही तनातनी जारी है, चीनी सेना अब अपने 1959 वाली एलएसी के दावे को मजबूती देने के लिए समर लुंग्पा, डेमचोक और चुमार सहित शेष छह मतभेद वाले बिंदुओं पर आक्रामकता शुरू कर सकती है। बता दें कि चीन के 1959 के एलएसी अवधारणा वाले दावे को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं खारिज कर दिया था। यही वजह है कि भारतीय सैन्य कमांडरों ने पूर्वी लद्दाख में भारी बर्फबारी से पहले पीएलए यानी पीपुल्स लिब्रेशन पार्टी के किसी भी दुस्साहस का जवाब देने के लिए सैनिकों को तैयार रहने को कहा है।
बता दें कि ध्रुवीय हवाएं और हिमपात न केवल जवानों पर बल्कि उनके हथियार और उपकरणों पर भी कहर बरपाएंगे। लद्दाख की ऊंची चोटियों पर ऐसी भीषण ठंड वाली परिस्थितियों में आर्टिलरी गन और टैंक बैरल फ्रीज हो जाते हैं। 15 नवंबर से मई तक दोनों सेनाओं की सबसे पहली प्राथमिकता पहाड़ी ऊंचाइयों पर ठंड से बचने के लिए होगी।
सीमा पर तानाव कम करने और शांति बहाल करने को भारत और चीन दोनों सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर विघटन करने में लगे हुए हैं मगर पश्चिमी थिएटर कमान के पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी के कमांडर केवल अपने कमांडर-इन-चीफ शी जिनपिंग की बात सुनते हैं, न कि बीजिंग में विदेश मंत्रालय के।
एक अधिकारी ने कहा कि लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास जमीन पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी भी यह समझती है कि भारतीय सेना उसकी किसी भी आक्रामकता का जवाब देने और उसे पीछे हटाने की क्षमता रखती है। फिलहाल, पीएलए के सैनिकों ने पैंगोंग त्सो के उत्तर में लाउडस्पीकर पर पंजाबी गाने बजाना बंद कर दिया है और दक्षिण में मनोवैज्ञानिक युद्ध के संदेशों ने भारतीय सैनिकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी आक्रमण गंभीर प्रतिशोध को आमंत्रित करेगा।
इससे पहले चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि बीजिंग एलएसी की अवधारणा के बारे में 1959 के अपने रुख को मानता है। हालांकि, चीन के बयान पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, ”भारत ने कभी भी 1959 में एकतरफा रूप से परिभाषित तथाकथित वास्तविक नियंत्रण रेखा को स्वीकार नहीं किया है। यही स्थिति बरकरार रही है और चीनी पक्ष सहित सभी इस बारे में जानते हैं।” अनुराग श्रीवास्तव की यह टिप्पणी तब आई जब चीनी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने सहयोगी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से कहा था कि चीन सात नवंबर 1959 को अपने तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भेजे गए एक पत्र में प्रस्तावित की गई एलएसी को मानता है।







