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दिग्विजय सिंह ने कहा( या नही कहा) कि कश्मीर में आर्टिकल 370 दुबारा बहाल करेंगे तो अंधभक्तों को मिर्ची लग रही है, वैसे जिस समय यह खबर टीवी पर दिग्विजय सिंह को कोसते हुये पत्तलकार चला रहे थे उसी समय कश्मीर में 4 सैनिकों की शहादत हो गई, आर्टिकल 370 हटने के बाद से लगातार सैनिकों की शहादत आठ दस गुना बढ़ चुकी है, न कश्मीर की जनता को सुकून है न सैनिकों को चैन है, आखिर जनता के घरों को जेल बनाकर बंदूक की नोक पर कौन सा लोकतंत्र चलता है?? आखिर आर्टिकल 370 लागू रहते हुये कश्मीरी कल्चर का साथ देते हुये कश्मीरी लोगों का दिल जीतकर देशप्रेम की भावना जागृत करके दुबारा उन्हें भारतीय मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जाये तो इसमें क्या बुराई है, सरकार कबतक जनता को उसके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखकर चुनाव नहीं करवायेगी? आखिर आजादी के बाद से लेकर 1989 तक इतने साल आर्टिकल 370 के साथ ही कश्मीर में सुख शांति थी और 2004 से 2014 के बीच दुबारा स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ था और लोग मुख्यधारा से वापस जुड़ने लगे थे, हमें याद रखना चाहिये कि 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान कश्मीर घाटी में रिकार्ड 54 से 70% तक मतदान हुआ था जो कश्मीर की अधिकतर जनता का भारतीय लोकतंत्र में विस्वास दर्शाता है लेकिन अफसोस कि नरेंद्र मोदी कश्मीरी जनता की समस्याओं के खिलाफ लड़ने की बजाय कश्मीर की पीड़ित आम जनता को ही दुश्मन घोषित करके उनके घरों को जेलखाना बनाकर रख दिया क्योंकि इससे भाजपा की हिन्दी पट्टी के कुंठित समाज में प्रोपोगेंडा करके एंटी मुस्लिम मानसिकता को संतुष्ट करके सहानुभूति और वाहवाही लूटी जा सकती थी और हुआ भी यही. नतीजा यह है कि आतंकवाद तो अब बढ़ ही गया है साथ ही साथ जो कश्मीरी भारतीय लोकतंत्र में विस्वास रखते थे अब उन्हें भी भारतीय शासन प्रणाली से डर लगने लगा है और खतरा महसूस होने लगा है.
मैं नहीं मानता हूँ कि आर्टिकल 370 कोई समस्या था, कश्मीर का आतंकवाद और अलगाववाद एक अलग समस्या है इसका आर्टिकल 370 से क्या लेना देना है यह मुझे आजतक समझ नहीं आया. आर्टिकल 370 जैसे अधिकार और भी कई प्रदेशों को दिये गये हैं उत्तराखण्ड, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, यहाँ तक की गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थानीय नागरिकों की लोक संस्कृति के संरक्षण के नाम परइसी तरह की धारायें लागू हैं
Writer Arvind Kumar
Jan Vichar Samvad Group








