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यूपी में पिछले दस दिन से एंबुलेंस सेवा बाधित चल रही है। लगभग 25 हजार कर्मचारी विभिन्न मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार और प्रदर्शनकारी आमने सामने हैं। सरकार उनकी वाजिब मांग भी सुनने का तैयार नहीं है। कर्मचारियों ने सरकार को चेतावनी दे रखी है कि जब तक सरकार उनकी मांगों को मानेगी नहीं वो ड्यूटी पर नहीं लौटेंगे। वहीं सरकार ने भी अढ़ियल रवैया अपना रखा है। सरकार ने अम्बुलेंस सेवा के लिये किसी एजेंसी को हायर कर रखा है। सरकार व कर्मचारियों के अढियल रवैये का खमियाजा मरीजों और उनके परिजनों को भगतना पड़ रहा है।
शहरों में लोग अपने अपने रोगियों केा निजी वाहनों, टैंपो, जीप और दो पहिया वाहनों पर लाने पर मजबूर हैं। गांवों में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं। वहां के लोग अपने मरीजों को एंबुलेंस के अभाव में चारपाइयों पर लाने को मजबूर हैं। पिछले दस दिनों से बरसात ने कहर ढा रखा है। उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। सरकार तो कान में तेल डाल कर बैठी है।
5000 एंबुलेंस में लगभग 25 हजार कर्मचारी सेवारत हैं। उनकी मांग हैं कि उन्होंने कोरोना काल में अपनी जान जोखिम में डाल कर लोगों की सेवा की। हमारी सरकार से मांग है कि उनका जीवन बीमा कराया जाये। इसके अलावा उन्हें सरकारी सेवाओं में समायोजित किया जाये। ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके। इसके अलावा उन्हें भी सरकारी कर्मचारियों की तरह अन्य भत्ते व सुविधाये भी दी जायें। एक एंबुलेंस में चार से पांच लोग नियुक्त रहते हैं।
लेकिन योगी सरकार ने उनकी बातों को मानने से इनकार कर दिया है। उन्होंने एजेंसी से इस समस्या का समाधान निकालने का आदेश दिया है। एजंेसी ने भी पुराने कर्मचारियों को हटा कर नयी स्टाफ की नियुक्ति का ऐलान कर दिया है। 25 हजार लोगों की नियुक्ति और प्रशिक्षण देना इतना आसान नहीं है। इस गंभीर समय में एंबुलेंस सेवा का तुरंत समाधान निकालना सरकार की प्राथमिकता होना चाहिये।

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