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भागलपुर दंगो पर मेरी यह रिपोर्ट 10 साल पहले “चौथी दुनिया” ने छापी थी। 33 साल पहले हुए इस दंगे के निशान अब भी हरे हैं और आगे सौ साल तक हरे ही रहेंगे। समय मिले तो पढ़िए देश के सर्वाधिक हिंसक और क्रूर समय में भाजपा के पापों का पर्दाफाश करती यह रिपोर्ट जो कश्मीर फाइल्स की तरह गल्प नही
हकीकत है।
21 साल 1 महीना 1 दिन! आप कह सकते हैं इतना समय किसी भी ज़ख्म को भरने के लिए काफी होता है। मगर कुछ ज़ख्म ऐसे भी होते हैं जिनके भरने में पीढियाँ गुजर जाती हैं। बिहार के भागलपुर शहर को भी एक ऐसी ही चोट लगी। ऐसी चोट जिसके घाव आज भी यहाँ के बाशिंदों की आँख से रिसते रहते हैं। दर्द है कि ख़त्म होने का नाम नहीं लेता। कभी मस्ज़िद की अजान से तो कभी मंदिरों की घंटियों से तो कभी अदालतों के फैसले से और भी बढ़ जाता है।
बुन्नी बेगम को अपने हाथों से खाना खाए उतना ही समय हो गया है जितना समय इस शहर को दर्द सहते हुए। उन्हें अब भी लगता है किसी दिन पगलाई भीड़ एक बार फिर आएगी और उनके बचे खुचे सपनों को रौंदते हुए चली जाएगी। भागलपुर के नया बाजार की बुन्नी अभी पिछले दिनों अपने बेटी और दामाद के साथ इस शहर को एक बार फिर सलाम कह गयी थी क्यूंकि बाबरी मस्ज़िद का निर्णय आने वाला था।
नूरपुर मोहल्ले का बूढ़ा रहमत दर्द कुरेदने पर कराह उठता है, उसे लगता है कि उसका पोता एक बार फिर बाबा बाबा कहते दौड़ता हुआ आएगा।
उसने अपनी आँखों के उस यकीन को मानने से इनकार कर दिया है जो एक कुएं में उसकी लाश को देखने से पैदा हुई थी। दंगा सिर्फ हत्याओं का एक बेहद क्रूर समयकाल नहीं होता, वो अपने साथ मनोवैज्ञानिक स्तर पर एक कभी ख़त्म न होने वाले युद्ध को भी जन्म देता है, सामाजिक और आर्थिक लड़ाइयाँ के भी नए पन्ने मुआवजों के लिए की जा रही जद्दोजहद से खुल जाते हैं। शहर कल भी सदमे में था, अब भी सदमे में हैं।
नया बाजार के रतन सिंह के घर ,जो जमुना कोठी के नाम से मशहूर है कि ओर जाने वाली सीढियों पर चढ़ते वक्त का अँधेरा अब भी कायम है,हमें ऊपर ले जाते वक्त रतन बताते हैं “यहीं से बलवाई ऊपर चढ़े थे”। छत पर हमारी मुलाकात मुन्नी बेगम से होती है साथ में २५ -२६ साल की जवान
बेटी है जो कम उम्र में ही डायबिटीज से पीड़ित है। हमें देखते ही मुन्नी बेगम अपने दोनों हाँथ जोडती है कटी हुई अँगुलियों से अभिवादन असहनीय हो
जाता है, सिर झुकाई मुन्नी की चुप्पी टूटती है “जानते हो न बेटा,ये मेरी बेटी है, इसी के यहाँ रहती हूँ ,मेरे लिए अपने पति रोटी चुराकर मुझे देती
है,उस दंगे ने मेरा सब कुछ छीन लिया”। बिटिया बीच में टोकते हुए कहती है “नहीं माँ ,इसलिए चोरी करती हूँ क्यूंकि तुम्हारी गैरत का ख्याल रहता है”।
बुन्नी बेगम बिलख पड़ती हैं ,रुंधे गले से दरवाजे की ओर इशारा करते हुए कहती हैं “यहीं से हमारा बाल पकड़ कर नीचे ले गए थे वो ,यहीं जहाँ मैं
बैठी हूँ पहले हमारी दोनों बहनों को काट डाला ,जब हमने कहा कि इन्हें मत मारो भैया तो पहले मेरी अंगुलियाँ काटी फिर मुझे ताबड़तोड़ छुरे मारकर
मरा हुआ समझकर चले गए “|जानते हैं आप ?इस एक छोटी सी छत पर २२ लोगों को मारा गया था और लगभग १८ लोग घायल हुए थे|पूरे पांच घंटे तक इस घर में इंसानों को जानवरों की तरह काटा जाता रहा, उधर हमारे घर धू -धू कर जल रहे थे। बुन्नी को दिए गए जख्मों की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती।जिस वक्त दंगाई शहर को रौंद रहे थे, ठीक उसी वक्त नया बाजार की गलियों में पिंकी और रूपु का प्यार परवान चढ़ रहा था। बताते हैं कि बुन्नी का छोटा बेटा रुक्कू मोहल्ले की ही एक हिन्दू लड़की के प्यार में पागल था|
वादे ,वफ़ा और उम्मीद्दें ,साथ जीने -मरने की कसमें सब कुछ इतने खून-खराबे के बाद भी कायम रहा ,और दंगों के कुछ ही दिनों बाद रूपु को बीच
सड़क पर दिन दहाड़े गोली मार दी गयी। बुन्नी बताती हैं “ये वही लोग थे जो उस दिन भीड़ में शामिल थे, उन्हें गवारा नहीं हुआ मेरे बेटे का किसी हिन्दू लड़की से प्यार। ये उस दिन भी थे जब हम पुलिस के सामने सड़क पर घायल पड़े थे और वे दिखाने के लिए मुझे सड़क से उठाकर मेडिकल वैन में रख रहे थे। मैं बार बार चीखती रही कि इसी ने काटी है मेरी अंगुलियाँ, मगर पुलिस ने अनसुना कर दिया”।
बुन्नी रुक्कू के एक प्रेम पत्र को दिखाती हैं मेरी निगाह मटमैले हो चुके पन्ने पर एक जगह जाकर ठहर जाती हैं जहाँ लिखा है “ये दुनिया हमारी
तुम्हारी है ,नफ़रत करने वालों की नहीं ,हम हमेशा साथ रहेंगे”| जमुना कोठी में जो हत्याएं हुई उनमे एक अशरफ मास्टर भी थे बेहद दुबले पतले ,कहते हैं उस इलाके कई बच्चों को उन्होंने अंग्रेजी सिखाई ,कहते हैं कि उनको मारने वालों में उनके अपने छात्र भी थे अब २२ सालों बाद नया बाजार मुस्लिमों से लगभग खाली हो चुका है,ज्यादातर लोगों ने अपनी जमीन औने पौने दाम में बेच दी है और ये शहर ही छोड़कर जा चुके हैं ,बाजार के कोने पर स्थिति मस्जिद की अजान थक हार कर शांत हो चुकी है,जो इक्का -दुक्का लोग रह गए हैं उनके लिए जिंदगी का सफ़र अब भी बेहद मुश्किलों भरा है ,दंगा पीड़ितों को हाल ही मे मिली मुआवजे की राशि इतनी कम है कि उससे कैसी भी किस्म का सपने नहीं ख़रीदे जा सकते |
दाने दाने को मोहताज दंगा पीड़ितों के आंसू पोछने के लिए कभी किसी भी
सरकार ने कोई दरियादिली नहीं दिखाई |दंगाइयों में से ज्यादातर आज भी खुलेआम घूम रहे हैं |बुन्नी की बेटी दरकचा जिसका हिंदी में अर्थ चमकना
होता है से जब हम पूछते हैं क्या अब भागलपुर चमक रहा है? वो बुझी आँखों से अपने घर की ओर देखते हुए कहती है” हाँ ,शहर चमक रहा है लेकिन हमारा घर नहीं ,शायद कभी नहीं चमके”| सीढियों से उतरते हुए बुन्नी अचानक बोल पड़ती हैं “जानते हैं भाई ,दंगाइयों ने किसी कि इज्जत नहीं लूटी ,वो चाहते थे तो ऐसा कर सकते थे “!
क्या इस बात पर हमें गहरी सांस लेनी चाहिए ?जवाब शाह जंगी में मिलता है| तंग गलियों में बसी दंगा पीड़ितों की इस बस्ती के ज्यादातर घरों में छत
पर टीन पड़ी हुई है ,गली के मुहाने पर ७० से ८० साल के दरमियाँ उम्र वाले ५-६ बुजुर्ग ताश खेल रहे हैं ,सड़क पर ही बैठे हुए लाठी लिए एक बूढ़ा हमें देखकर उठ खड़ा होता है |कौन हो बाबा ?
लडखडाती हुई आवाज आती है “मैं …..गुलजार खान ,दंगे में मेरी बेटी ,मेरी बीबी और मेरे पोते को मार दिया! बीबी और बेटी को मारा, मगर उस बच्चे को क्यूँ मारा? मैं अनुत्तरित पूछ बैठता हूँ “क्या फर्क पड़ा उस दंगे का आपकी जिंदगी पर? ” अरे बाप रे ” इस बार गुलजार के चेहरे पर दर्द के साथ -साथ आंसू छलक पड़ते हैं वो कहते हैं “बहुत याद आती है भाई उन सबकी “|
हम पूछते हैं क्या आप जानते हैं किन्होने मारा आपके घर वालों को? गुलजार का जवाब आता हैं “अब भी वो खुलेआम घूमते हैं ,हम कुछ भी नहीं कर सकते |गुलजार के घर अब न तो कमाने वाला है न पका कर खिलाने वाला ,बूढी हड्डियाँ अब जवाब दे रही है| गुलजार और उस जैसे कईयों को अपनी नियति का पता है ,गुलजार कहता है “देखिएगा, एक दिन सड़क पर लावारिस मर जाऊंगा|सरकार दंगाइयों को सजा न दे सकी हमें जीने का हक़ तो दे देती “|उसे क्या मालूम सत्ता न सिर्फ गूंगी है बल्कि बहरी भी हो चुकी है|थोड़ी ही दूर पर रेहाना का घर है ,जवान बेटी,खाली रसोई | दंगाइयों ने बेटे
को तो मारा ही ,नया बना घर भी फूंक डाला ,रेहाना बताती हैं “हम दाने दाने को तरसे हैं हालात ये थे कि नाली का भी पानी पी लेते” |
रेहाना के बगल में बैठी उनकी बेटी बताती हैं कि” भैया तो यहाँ रहता भी नहीं था दिल्ली में काम करता था ,उसे तो मालूम भी नहीं था कि शहर में
दंगा हो गया है जब वो छुट्टियों में घर आ रहा था रास्ते में ही बलवाइयों ने उसे मार दिया, हम एक घर से दूसरे घर में पनाह मांगते रहे पर किसी ने
आसरा नहीं दिया “|रहना का छोटा बेटा बताता है ” दंगों के बाद माल-असबाब की क्षतिपूर्ति के रूप में कुछ नही दिया गया जो थोड़े से पैसे उस वक्त
मिले थे वो खर्च हो गए ,न तो कोई रोजगार मिला और न ही जीने की बुनियादी सुविधाएँ”| रेहाना के घर के आगे नसीमा का घर है ,मोहल्ले वाले आगे जाने से रोक देते हैं ,वहां उसका विक्षिप्त बेटा है बताते हैं दंगे वाले साल ही पैदा हुआ था तभी से पागल है किसी पर भी हमला बोल देता है |नसीमा ने अपने पति और एक दूसरे आठ साल के बेटे को दंगे में खो दिया था उनकी लाश एक मस्जिद के पास के कुएं में मिली |हम नसीमा से पूछते हैं आपके पति और बच्चों को किसने मारा ?वो फूट पड़ती है हिन्दुओं ने मारा ,तब तक उसका विक्षिप्त बेटा दौड़ता हुआ आता है “नहीं काफिरों ने मारा ! “हम स्तब्ध है|
चार बेटियों की माँ नसीमा को लाबी लड़ाई के बाद मुआवजा मिल गया है लेकिन सबकी किस्मत एक जैसी नहीं है |शाह जंगी ,नया बाजार और जगदीशपुर के इलाके में तमाम मुस्लिम परिवार ऐसे हैं जिन्हें मुआवजे के रूप में अभी एक ढेला नहीं मिला है ,शर्मनाक ये है कि दंगों के लगभग २२ साल बाद बाद भी दंगा पीड़ितों को अपनी पहचान साबित करनी पड़ रही है| गंदगी से बजबजाती गली में आगे शबनम का मकान है वो अब मायके में रहती हैं बीड़ी बनाती हैं और उसी से घर चलता है ,नीतीश के जनता दरबार में वो दो बार हाजिरी लगा आयीं मगर कुछ न हुआ ,बार बार वायदे किये जाते हैं मगर कहीं कोई सुनवाई नहीं है| जिस वक्त पति की हत्या हुई बिटिया पेट में थी ,उसकी मौत के बाद पूरे घर पर कहर टूट पड़ा |शबनम की बताती है “उस वक्त हम नूरपुर मोहल्ले में
रहते थे, हमारा दामाद जमाल कलकत्ता में पढाता था ,शहर में दंगा हुआ तो
पुलिस वाले हमें उठाकर दूसरी जगह ले गयी ,जब हम वापस लौटे तो घर जला हुआ
था और मेरे पति गायब थे |जानते हैं हम खाने की बात तो दूर पानी को भी तरस
गए थे , हमें आज भी लगता है वो लौट आयेंगे ,उनकी लाश नहीं मिली तो क्या
इसमें मेरा कसूर है ? हम औरत की जात कोई पुरुष नहीं ,साथ में गर्भवती
बेटी कहाँ खोजते उसको ?अब नतिनी बड़ी हो गयी है कहाँ से इसकी शादी करें
“|
शबनम उन दंगों के लिए किसी हिन्दू को कुसूरवार नहीं मानती वो कहती हैं कि
जहाँ हिन्दू ज्यादा थे वहां मुसलमान मारे गए जहाँ मुसलमान अधिक थे वहां
हिन्दू अधिक मारे गए |लेकिन हाँ ,बार बार सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों
के घरों का चक्कर लगाते लगाते वो थक गयी है ,कहती है “देखिएगा किसी दिन
जान पूरे परिवार के साथ जान दे देंगे” |
चंदेरी गांव की मलका बेगम की कहानी दिल दहला देने वाली है ,दंगाइयों ने
उसकी टाँगे काटकर उसे एक तालाब में फेंक दिया था |दंगों के बाद जब सेना
तैनात की गयी तो मोहम्मद ताज नाम के एक जवान से उसे प्यार हो गया ,जब वो
अस्पताल से बाहर आयी तो जम्मू कश्मीर बटालियन में तैनात उस जवान ने उससे
शादी कर ली ,ताज से उसे बच्चे भी हुए |लेकिन जैसे ही मलका को मुआवजे की
राशि मिली ताज, मलका और उसके दो बच्चों को धोखा देकर फरार हो गया। 1993
में मलका ने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज भी करवाया। आज तक कोई राहत उसे नहीं
मिल पाई है। मलका के बच्चे आज भी अपने अब्बा का इन्तजार करते हैं ,न्याय
की आस लगातार धूमिल होती जा रही है |
अशरफ नगर में महमूद खान की नाराजगी उनके चेहरे से नजर आती है ,पावरलूम
चलाते हैं ,हाड़ तोड़ मेहनत के बावजूद बमुश्किल १०० रूपए कम पाते हैं
|खूनी मंगलवार अब भी उनके जेहन में ताजा हैं ,बताते हैं “हमने उस दौरान
अपने दोस्तों के चेहरे भी बदलते देखे| चम्पानगर में उस दिन सारी लड़कियों
को पड़ोस के गाँव में भेज दिया गया ,गाँव में सिर्फ बूढ़े -बुजुर्ग और हम
कुछ लड़के रह गए ,रात को बम का धमाका हुआ इसके पहले कि हम भी निकलते
दंगाइयों ने हमला बोल दिया ,मेरे घर वालों को तो मारा ही ,मेरे वालिद और
मेरी जीवन भर की कमाई को भी आग के हवाले कर दिया |
कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई ,दंगों के बाद दंगाइयों ने हमारी जमीन और खेत
पर कब्ज़ा कर लिया ,हमारी हिम्मत नहीं थी कि उनसे खाली कर सकें ,२५०0 रूपए
में मकान ,६ हजार रूपए में हमने अपना खेत बेच दिया |जिन लोगों ने हत्याएं
कि वो आज भी खुलेआम घूम रहे हैं ,महमूद खान बताते हैं सिर्फ चम्पानगर में
ही नहीं पूरे भागलपुर में दंगों ने नए रईस पैदा कर दिए ,हमारे मकान जले
,समान जले सब कुछ तबाह हो गया ,बेशर्मी ये कि लोगों को ६०० रूपए से लेकर
६००० रूपए तक क्षतिपूर्ति दी गयी |
आज भी समूचे भागलपुर और उसके आस पास के दंगा प्रभावित गाँवों में जमीनों के मजबूरी वाले सौदे हो रहे हैं,खौफ पैदा करने वालों की जमात नीतीश सरकार में भी फल फूल रही है दंगों के बाद भागलपुर के मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी दूसरे शहरों में पलायन कर गयी ,ये पलायन आज भी जारी है| जिस वक्त हम ये रिपोर्ट लिख रहे थे शहर फिर सहमा हुआ था ,देश भर के संत महात्माओं का सम्मलेन यहाँ के बाशिंदों के लिए डरने की नयी वजह लेकर आया था | भागलपुर के लोगों ने डर कर जीना सीख लिया है ,वो नहीं जानते कब किधर कहाँ से वो खूनी मंगलवार फिर से उनके दरवाजे पर दस्तक दे जायेगा|
Awesh Tiwary
यह लेख स्वतंत्र पत्रकार का है ये उनके अपने विचार हैं इससे वेबसाइट का सहमत व जिम्मेदार होना जरूरी नहीं है।

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