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8 नवंबर को देश के चर्चित सीजेआई डीवाई चंद्रचूड का सुप्रीमकोर्ट में आखिरी दिन था। इस दिन उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का मामला आने वाले नये सीजेआई पर टाल दिया जबकि इस बात को फैसला लगभग तय हो चुका था। लेकिन मामले को लंबा लटकाये रखने का इससे बेहतर उपाय हो भी नहीं सकता था। मामला एएमयू के वजूद और अल्पसंख्यक मान्यता को लेकर सुप्रीमकोर्ट में लंबित था। इस पर भी सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायधीश की आलोचना हो रही है।

चंद्रचूड ने अपने विदायी भाषण में बशीर बद्र का एक शेर सुना कर अपने आलोचकों को सुना दिया कि शेर ये था मेरा उसूल है कि पहले मैं सलाम करता हूं, मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ। इसके साथ यह भी कह दिया कि अब वो लोग सोमवार से बेरोजगार हो गये हैं। इससे मसाफ जाहिर हो गया कि उन्हें सोशल मीडिया पर जो ट्रोल कर रहे हैं उससे वो काफी आहत हैं। लेकिन अपने मन की बात को जाते बता गये कि वो कमजोर नहीं बल्कि काफी मजबूत हैं। पूर्व सीजेआई के बारे में देश के जाने माने वकील और कानून के जानकारोंं ने उनके रवैये की कड़ी आलोचना की थी। लेकिन चंद्रचूड के विदायी समारोह में नये सीजेआई संजीव खन्ना और सुप्रीमकोर्ट बार एसोसियेशन अध्यक्ष कपिल सिब्बल ने भी पूर्व सीजेआई की शान में कसीदे पढ़े। दिलचस्प बात यह है कि यही कपिल सिब्बल दो पहले ही चंद्रचूढ़ पर तीखी टिप्पणी कर रहे थे। इससे पहले भी वो पीएम लेकिन पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूढ़ ये भूल गये कि सोशल मीडिया पर हीरो भी उनके आलोचकों ने ही बनाया था। उनको सोशल मीडिया पर स्टील की रीढ़ वाला अभूतपूर्व सीजेआई के रूप में प्रचारित प्रसारित किया था।
आखिर सीजेआई की आलोचना क्यों हुई
पिछले कई माह से चंद्रचूड को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है। ये बात तब शुरू हुई जब गणेश चतुर्थी की पूजा पर सीजेआई रहते हुए चंद्रचूड ने अपने सरकारी आवास पर पीएम मोदी को आमंत्रित किया और पीएम ने वहां की पूजा की फोटो और वीडियो को अपने ट्विटर हैंडिल से पोस्ट करवा दिया। इससे पूरे देश में यह वायरल हो गया। इइतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि जब सीजेआई ने किसी पीएम को अपने निजी कार्यक्रम में आमंत्रित किया था। इस बात को लेकर सीजेआई की मजम्मत शुरू हो गयी कि रिटायरमेंट करीब देख कर सीजेआई पीएम मोदी के करीब होने का प्रयास कर रहे हैं।

इसी बीच सीजेआई के पिछले माह के फैसलों पर लोग विवेचना करने लगे। सोशल मीडिया पर उनके किये गये फैसलों पर भी आलोचना होने लगी। सोशल मीडिया और यू ट्यूबर्स में भी सीजेआई की आलोचना शुरू हो गयी है। ये बात सीजेआई को बुरी तरह चुभने लगी। इसके लिये वो अपने बचाव में मीडिया से मुखातिब होने लगे। मीडिया उनके बयानों को प्रमुखता से छापने लगा तो लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि ये सीजेआई की आत्म ग्लानि है जो उन्हें सफाई देने को मजबूर कर रही है।
इन मामलों में पूर्व सीजेआई ने सख्त कदम नहीं उठाये
यह बात तो सही है कि पिछले डेढ़ साल में चंद्रचूड़ ने ऐसे कई केस में अहम् फैसले दिये, जिनकी आम लोगों ने काफी तारीफ की। जैसे सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का आदेश। दूसरा बिलकीस बानो गैंगरेप केस में 11 अपराधियों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र व गुजरात सरकार के फैसलों पर रोक लगायी। राहुल गांधी की संसद सदस्यता बहाल करने के फैसले को जनता ने काफी सराहा। कुछ सुप्रीम कोर्ट ने सत्ता विरोधी दलों के नेताओं को जमानत देने में सुप्रीमकोर्ट ने राहत दी। लेकिन ऐसे बहुत से मामलों सीजेआई ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया जिससे सरकार को परेशानी हो सकती थी। सीजेआई रहते हुए देश के बहुत बड़े चुनावी चंदा घोटाले में सीजेआई ने कोई कड़ा कदम सरकार के खिलाफ नहीं उठाया वर्ना केन्द्र सरकार परेशानी में पड़ सकती थी। यहां तक कि इस घोटाले में आरोपी एसबीआई के खिलाफ कोई ऐक्शन नहीं लिया। चुनावी चंदे को अवैध तो करार दिया लेकिन न तो उस चंदे को वसूलने का आदेश दिया और न ही उन कंपनियों के खिलाफ ऐक्शन लिया जिन्होंने चंदे के बदले सरकारी प्रोजेक्ट हासिल किये हैं। इस बात ने भी जनता में यह संदेश दिया कि सीजेआई ने पहले लोकप्रिय होने के लिये कुछ मामलों में अहम् फैसले दिये। बाकी मामलों में वो सरकार के साथ रहते दिखायी दिय।
जस्टिस लोया के रिव्यू मामले में पिटीशनों को फटकारा
जैसा कि सबको मालूम है कि होम मिनिस्टर अमित शाह सीबीआई स्पेशल कोर्ट के जस्टिस लोया की संदिग्ध हालात में मौत के मामले में मुख्य आरोपी थे। पिछले दिनो जस्टिस लोया की मौत की रिव्यू के लिये पिटीशन कोर्ट में रिट डाली थी। चंद्रचूड़ ने याचियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यह सब राजनीति से प्रेरित मुद्दे हैं। इस बात की भी सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हुई थी।
राममंदिर फैसले पर सीजेआई का खुलासा
नवंबर 2019 में सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने अयोध्या मंदिर और बाबरी मस्जिद पर अपना फैसला दिया था। चार जजों ने अपने फैसलों में दस्तख्त किये थे। लेकिन एक सदस्य ने अज्ञात फैसला दिया था। उनमें डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे। उस फैसले के पांच साल बाद चंद्रचूड़ ने यह खुलासा किया कि वो अज्ञात फैसला लिखने वाले जज वो ही थी। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि फैसला लिखने की एक रात पहले वो रात भर मंदिर में बैठे भगवान की शरण में थे। भगवान ने उन्हें फैसला लेने में मदद की थी। लोग उनकी इस बात को लेकर काफी आलोचना कर रहे हैं कि न्याय व्यवस्था और संविधान के बीच न तो भगवान होते हैं और न ही धर्म आस्था। न्यायिक प्रक्रिया मा मंदिर तो संविधान है हर जज को उसके जरिये ही फैसले लेने का अधिकार है।
दिल्ली के एलजी के मामले को दूसरी बेंंच में क्यों भेजा
जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच से मामला हटा कर सरकार को मुसीबत से बचाने का खेल भी पूर्व सीजेआई ने किया था। क्यों कि जस्टिस कौल 15 दिनों बाद रिटायर होने वाले थे। उनकी बेंच में दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना का मामला आया था। जस्टिस कौल धड़ाधड़ मोदी सरकार के खिलाफ ऐक्शन ले रहे थे। रातों रात वो केस संजय किशन कौल की लिस्ट से गायब कर दिया गया। इस बात से जस्टिस कौल को काफी गुस्सा आया क्यों कि वो इस मामले में सख्त आदेश देने वाले थे। बाद में उस केस को किसी फेवरेबल जज को सौं दिया गया।
चंडीगढ़ मेयर इलैक्शन का घोटाला
इसी साल चंडीगढ़ मेयर का इलैक्शन हुआ जिसमें प्रिसाइडिंग अफसर अनिल मसीह ने कैमरे के सामने आम आदमी पार्टी के कुछ वोट कैंसिल कर बीजेपी के उम्मीदवार को मेयर बनवा दिया। जब मामला गरमाया तो सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा इस पर सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए आप और कांग्रेस के उम्मदवार को विनर घोषित करवा दिया। लेकिन उस घोटाले में जो प्रिसाइडिंग अफसर अनिल मसीह के खिलाफ ऐक्शन नहीं लिया बस टिप्पणी कर छोड़ दिया गया। चुनाव आयोग की लापरवाही भी सामने आयी कि उसने ऐसे व्यक्ति को प्रिसाइडिंग अफसर कैसे बना दिया जो बीजेपी का नेता रहा है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी पर सवाल तो उठता है।








