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हाल ही चुनाव आयोग ने शिवसेना ठाकरे और शिवसेना शिंदे गुट को अंधेरी ईस्ट उपचुनाव के लिये चुनावी सिंबल अलाट किये जिसमें ठाकरे गुट को जलती मशाल और शिंदे गुट को तलवार और ढाल चुनाव चिन्ह मिले हैं। चूंकि शिवसेना के दो दावेदार हो गये हैं जिससे चुनाव आयोग ने यह फैसला किया कि जब तक शिवसेना के असली हकदार का फेसला न हो जाता तब तक दोनों ही गुट उपरोक्त चुनाव चिह्न पर ही प्रचार कर सकेंगे।
ठाकरे गुट का चुनाव आयोग पर यह आरोप है कि आयोग ने उनके प्रस्तावित चुनाव चिह्न को शिंदे गुट को लीक कर दिया जिससे उन्हें अपने चुनाव चिह्न चुनने में आसानी हुई। यह एक गैर संवैधानिक प्रक्रिया माना जाता है कि किसी पार्टी के गोपनीय पत्र को अन्य दल के नेताओं पत्र का खुलास करना अपराध की श्रेणी में आता है। यह भी आरोप लगाया है कि उन्हें आयोग तीसरे वरीयता का चिह्न आवंटित किया गया जबकि शिंदे गुट को उनके पहली वरीयता का चुनाव चिह्न अलाट किया गया है। इसमें भी चुनाव आयोग पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है। वैसे भी चुनाव आयोग पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वो सत्ताधारी दल के साथ नरम रवैया अपनाता है। यह भी आरोप लगते रहे हैं कि चुनाव आयोग चुनाव कराने की प्रक्रिया भी पीएमओ के सिफारिश के बाद ही ऐलान करता है।
जैसा कि मालूम है कि दो तीन माह पहले महाराष्ट्र सरकार के मंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने चाली स विधायकों के साथ बगावत करते हुए बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था। इससे तत्कालीन सीएम उद्धव ठाकरे को पद से इस्तीफा देते हुए कहा कि सत्ता के भूखे नहीं हैं। लेकिन एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर प्रदेश के सीएम पद को संभाल लिया। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस वर्तमान सरकार ने डिप्टी सीएम हैं। यह बात और है कि सरकार डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ही चला रहे हैं। एक नाथ शिंदे नाममात्र के सीएम हैं। इस सरकार के बनने से केवल एकनाथ शिंदे को ही फायदा हुआ है और किसी बागी विधायक को कुछ भी फायदा नहीं हुआ है। सिर्फ इस बात की संतुष्टि है कि वो सरकार और सत्ता की सुविधा उठा रहे हैं। लेकिन जनता के सामने वो शिवसेना के बागी विधायक हैं जिन्होंने पार्टी से गद्दारी की है।








