एमपी के सीएम शिवराज सिंह या हरियाणा के खट्टर जब अपने यहां किसानों से उपज की खरीद पर अपनी पीठ थपथपाते हैं, तो आपको सरकारों में भगवान नज़र आते हैं। लेकिन ज़रा नज़र नीचे कीजिये। थोड़ा शर्मसार होइए, क्योंकि जो ग्रामीण समाज अपने जरूरत का साल भर का अनाज स्टोर कर लेता है, उसी देश में अनाज के भंडारण की जगह नहीं है।
सियासत का अमानवीय गणित कहता है कि लोग भले भूखे मरें, गोदाम अनाज से भरे होने चाहिए। नतीजतन, पहली जनवरी से 1 मई तक देश में करीब 72 लाख टन अनाज़ सड़ चुका है। शहरों की ऊंची इमारतों में बैठे सूट-बूट वालों को क्या पता कि ये अनाज असल में शराब लॉबी के लिए सड़ाया जाता है। आपको तो सिर्फ बियर पीने से मतलब है।
72 लाख टन। मोदी की ग़रीब कल्याण अन्न योजना के तहत अप्रैल और मई में कथित रूप से बांटे गए अनाज से भी ज़्यादा। ये आज से नहीं, बीते 3 साल से एफसीआई गोदामों में अनाज से भरी बोरियों के बीच बैठी भूखी अवाम के मरने का इंतज़ार कर रही है।
मोदी खुद को कितना भी ग़रीबों के हिमायती बताएं, लेकिन सच यही है कि उनकी सरकार वित्तीय घाटे को कम रखने की फिक्र में गोदाम से अनाज़ उठाने में कंजूसी करती है। पहले की यूपीए सरकार तो एफसीआई के नुकसान की भरपाई कर देती थी। लेकिन मोदी के आने के बाद खाद्य सहायता का 60% से भी कम एफसीआई को जा रहा है।
अब सरकार पैसा नहीं दे रही तो एफसीआई एफसीआई बाहर से उधार ले रही है। 31 दिसंबर की तारीख में एफसीआई के खाते में 2.36 लाख करोड़ का कर्ज है। मोदी शायद एफसीआई को भी बेचना चाहते होंगे या फिर अडाणी, अम्बानी या किसी शराब कंपनी के पास गिरवी रखना, ताकि लोग शराब के लिए तरस जाएं और सरकार उन्हें बियर आफर करे।
मोदी की गरीब समर्थक छवि को इस सच्चाई से भी तगड़ा झटका लग सकता है कि उनकी ही सरकार एफसीआई को खुले बाजार में सरप्लस अनाज़ बेचने का दबाव डालती है। वह भी खरीद से कम कीमत पर। कोई भी असली पत्रकार इस पर स्टोरी कर सकता है कि असल में इस बिकवाली का पैसा किसकी जेब में जाता है और मोदी की पार्टी बीजेपी को इसका कितना हिस्सा मिलता है।
2019-20 में एफसीआई केवल 14.5 लाख टन अनाज ही खुले बाजार में बेच पाई। अब रबी के सीजन में खरीदी को देखते हुए मोदी सरकार ने फिर एफसीआई को औने-पौने दाम पर अनाज बेचकर गोदाम खाली करने को कहा है। फिर भी मोदी सरकार 8.23 करोड़ टन अनाज की बोरियों पर बैठी है। जबकि बफर स्टॉक 2.10 करोड़ टन का है।
भूख की सियासत होती है। भूख राजनीतिक दलों के लिए चंदा है। सरकार बनाने-गिराने का खेल है। भूख नेताओं के लिए मोटी कमाई का जरिया भी है। फिर भी देश के सबसे बड़े सरकारी वकील हम जैसे सवाल उठाने वालों को गिद्ध कहते हैं। Lockdown से देश को क्या मिला?नीचे लिखी बातें पढ़ने के बाद स्वयं विचार कीजियेगा
From facebook wall Saumitra Roy
Sr. Journalist








