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पुराने नेताओं को लेकर मोदी शाह की मंशा क्या है
नयी बीजेपी में वरिष्ठ और दिग्गज नेताओं को लेकर मोदी और शाह की मंशा क्या है इस बात की चर्चा जोर शोर से चल रही है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जिस प्रकार मुख्यमंत्रियों का चयन हुआ इससे साफ जाहिर है कि अब दिल्लीी दरबार को किसी भी िदग्गज और वरिष्ठ नेता के प्रभाव और वर्चस्व से कोई मतलब नहीं। अगर सीधे शब्दों में यह कहा जाये कि दिल्ली दरबार को संदेश ही आखिरी माना जायेगा। उस पर कोई सवाल या जवाब की गुंजायश नहीं है। हाल में बनाये गये राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्रियों का मामले में यह साफ हो गया है। सिर्फ मोदी शाह का फैसला ही अंतिम फैसला होगा चाहे वो मामला प्रदेश का हो या केन्द्र सरकार का हो।
खाता न बही मोदी कहें वही सही
केन्द्रीय नेतृत्व ने यह संदेश दे दिया हे कि मोदी का फैसला ही पार्टी फैसला है किसी की टीका टिप्पणी की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। यह मान लिया गया है कि अगर मोदी चुनाव जितवाते हैं तो मोदी ही सरकार और पार्टी के सारे फैसले लेंगे। हैरानी की बात यह है कि पिछले नौ साढ़े नौ साल में यह देखा गया है कि जो फैसला पीएम मोदी ने कर दिया किसी भी मंत्री या नेता की हिम्मत नहीं जो उस पर सवाल उठा दे। मध्यप्रदेश में जब मुख्यमंत्री पद के लिये मोहन यादव का नाम लिया गया तो पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश में उबाल आ गया। लेकिन किसी ने उस नाम पर कोई आपत्ति नहीं जतायी।

मंत्री या नेता की जुबां पर ताला पड़ा
चुनाव परिणाम आने के बाद से प्रदेश के नेताओं और केन्द्रीय मंत्रियों ने दिल्ली जाकर अपनी उममीदवारी जतानी शुरू कर दी। लेकिन पूर्व सीएम शिवराज ने दिल्ली जाने की जहमत नहीं उठायी वो दिल्ली दरबार की नीयत पहले ही भांप गये और भोपाल में ही अपने समर्थकों के बीच बने रहे। केन्द्रीय नेतृत्व ने सभी विजयी सांसदों के इस्तीफे लेकर यह साबित कर दिया कि अब आप प्रदेश की राजनीति करें। केन्द्र में वापसी की उम्मीद न करें। कृषि मंत्री तोमर को विधानसभा अध्यक्ष बना कर उन्हें संदेश दिया कि अब आपकी यही हद है। आप इसी पद पर संतोष करें। बाकी बचे सांसदों को जो अब विधायक बन चुके हैं उन्हें यह साफ कर दिया कि अब आप विधायक के तौर पर जनता के बीच रहें और आम चुनाव जिताने में जुट जायें। इनमे प्रहलाद पटेल, रीति पाठक, राकेश सिंह, फग्गन सिंह कुलस्ते शामिल है दिल्ली में ऐश की जिंदगी जी रहे थे। क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति वो कतई जागरूक थे।
पत्ता कटने वाली लिस्ट में अभी और भी नाम हैं
वसुंधरा राजे, रमन सिंह और शिवराज को मोदी शाह ने बड़ी आसानी से हाशिये पर ला दिया है। इस प्रकार केन्द्रीय नेतृत्व ने साफ संदेश दिया कि अब कोई भी नेता इस बात के गुमान में न रहे कि वो कितना पुराना और प्रभावी नेता है उसे किसी भी समय कार्यकर्ता बनाया जा सकता है। 2014 की जीत के बाद मोदी शाह ने सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी ओर मुरलीमनोहर जोशी के पर कतरते हुए उन्हें पथ प्रदर्शक मंडल में भेज दिया। यह बात जग जाहिर है कि किसी समय पीएम मोदी आडवाणी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। ंलेकिन पीएम बनने के बाद सबसे पहले आडवाणी को सक्रिय राजनीति से चलता किया। आने वाले समय में जिन मंत्रियों और नेताओं के नाम चर्चा में हैं उनमे राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हैं। लोकसभा चुनाव से पहले केन्द्रीय नेतृत्व कुछ बड़े फैसले ले सकता है। यह भी चर्चा है कि अगले आम चुनाव में भाजपा अपने दिग्गज सांसंदों और मंत्रियों को टिकट नहीं दिया जायेगा। उनकी जगह नये और युवा कार्यकर्ताओं को संसद में भेजा जायेगा। भाजपा के इस क्रांतिकारी कदमं से उपजे असंतोष से पार्टी कैसे निपटेगी यह एक दुरूह सवाल है। वैसे भाजपा के लिये ऐसे फैसले लेना कोई बड़ी समस्या नहीं हे जिस प्रकार से मोदी शाह ने शिवराज, रमन सिंह और वसुंधरा राजे को ठिकाना लगाया और किसी भी प्रकार के असंतोष का सामना नहीं करना पड़ा। इससे साफ जाहिर है कि आगे भी मोदी शाह के फैसलों के आगे किसी की भी हिम्मत नहीं होगी जो सवाल उठा सके।








