Why BJP & RSS leaders busy in spreading false agaist JL Nehru
Why BJP & RSS leaders busy in spreading false agaist JL Nehru
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आज़ादी की लड़ाई में गांधीजी और सुभाष को दो अलग छोरों पर खड़ा किया जाता रहा है. सुभाष उन नेताओं में थे, जिन्होंने महात्मा गांधी को हमेशा पूरा आदर दिया. वो ऐसे पहले शख्स भी थे, जिन्होंने गांधीजी को राष्ट्रपिता कहा. उन्होंने हर विदेशी मंच पर गांधी को पूरा सम्मान दिया. वो जहां कहीं भी रहे, गांधी के लिए अवनत रहे. उन्होंने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा और गांधी और नेहरू के नाम पर सेना की दो ब्रिगेड बनाई. आज़ाद हिंद फौज मे बापू की आलोचना प्रतिबंधित थी और ऐसा करने वालों को दंडित करने का नियम था. वहीं गांधी जी उन्हें पुत्रवत मानते थे और कहते थे “उनके और मेरे विचारों में भले ही अंतर रहा हो, लेकिन उनकी कार्यशक्ति और देशप्रेम के लिए मेरा सिर उनके सामने झुकता है.”
परस्पर वैचारिक असहमति के बावजूद दोनों ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अनुराग में कभी कमी नहीं होने दी।
इसका अंदाज नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 06 जुलाई 1944 को महात्मा गांधी के नाम आजाद हिन्द फौज रेडियो से दिए गए एक संदेश से जाहिर हो जाता है. इस संदेश झलकता है कि वास्तव में सुभाष के लिए गांधी क्या थे, वो उन्हें लेकर क्या सोचते थे और उन्हें भारत के आजादी के संघर्ष में कहां देखते थे. गांधी जी को प्रेषित अपने संदेश मे सुभाष ने लिखा था….
महात्मा जी,
दुनिया भर के हिंदुस्तानी आपके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं. अंग्रेजों की जेल में श्रीमती कस्तूरबा जी की दुखद मृत्यु के बाद देशवासियों के लिए आपके स्वास्थ्य के बारे में चिंतित होना स्वाभावित है. ये ईश्वर की कृपा है कि तुलनात्मक तौर पर आपके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. अब 48 करोड़ 80 लाख हिंदुस्तानियों को आपके मार्गदर्शन और सलाह का लाभ मिल सकेगा.
बेशक अंग्रेज सरकार समझाने, नैतिक दबाव बनाने और अंहिसक प्रतिरोध करने से आत्मसमर्पण नहीं करेगी लेकिन जब आपने दिसंबर 1929 की लाहौर कांग्रेस में स्वतंत्रता प्रस्ताव का समर्थन किया है, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्येक सदस्य के सामने एक समान लक्ष्य पैदा हो गया है. देश के बाहर के हिंदुस्तानियों के लिए आप देश में इस वर्तमान जागृति को लाने वाले हैं. सारे विश्व के सामने वो लोग आपको वह स्थान और सम्मान देते हैं , जो आपको मिलना चाहिए. विश्व के लोगों के लिए हम भारतीय राष्ट्रवादी एक ही हैं, जिनका जीवन में एक लक्ष्य, एक ही आकांक्षा और एक ही प्रयास है. 1941 में भारत छोड़ने के बाद मैं जिन देशों में भी गया और जो अंग्रेजी प्रभाव से मुक्त हैं, वहां आपको उच्चतम सम्मान से देखा जाता है, ऐसा सम्मान जो अन्य किसी भारतीय नेता को पिछली शताब्दी में नहीं मिला है.
असल में जो देश ब्रिटिश साम्राज्य के विरोधी हैं, उनमें आपके महत्व और आपकी उपलब्धियों की हजार गुना कद्र की जाती है, बनस्पित उन देशों के जो स्वतंत्रता और लोकतंत्र का मित्र होने का दावा करते हैं. देश के बाहर रहने वाले भारतीयों और भारत की स्वतंत्रता के विदेशी मित्रों के मन में आपके प्रति जो आदर है, वो सौ गुना अधिक बढ़ गया, जब आपने अगस्त 1942 में भारत छोड़ों प्रस्ताव का समर्थन किया.
ऐसा कोई भी भारतीय नहीं है, चाहे वो देश में हो या बाहर, जो इस बात से खुश नहीं होगा कि भारत को आजादी उस तरीके से मिल जाए, जिसका आपने आजीवन समर्थन किया है और जिसमें मानव रक्त नहीं बहाना पड़े. जैसी परिस्थितियां अभी हैं, उसमें मुझको पूरा विश्वास हो गया है कि यदि हम आजादी चाहते हैं तो हमें खून की नदी पार करनी होगी.
यदि परिस्थितियां ऐसी होतीं कि हम भारत के अंदर से ही अपने प्रयासों और संसाधनों की सहायता से एक सशस्त्र संघर्ष शुरू कर सकते तो हमारे लिए सबसे अच्छा रास्ता होता. लेकिन महात्मा जी, आप भारतीय परिस्थितियों के बारे में किसी भी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा बेहतर जानते हैं. जहां तक मेरा सवाल है, भारत में 20 सालों की जन सेवा के अनुभव के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बाहर से बगैर थोड़ी मदद लिए-विदेशों में रहने वाले हमारे देशवासियों के साथ साथ -साथ किसी अन्य देश या देशों की मदद लिए बिना-देश में एक सशस्त्र विरोध संगठित करना असंभव था.
महात्मा जी, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इस खतरनाक मिशन पर निकलने का निर्णय लेने के पहले मैने दिनों, हफ्तों और महीनो तक सावधानीपूर्वक इस मामले के पक्ष और विपक्ष पर विचार किया था. अपनी क्षमता भर अपने लोगों की इतने लंबे समय तक सेवा करने के बाद मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं हो सकती थी कि मैं गद्दार बनूं या किसी को मुझे गद्दार कहने का कारण दूं.
महात्मा जी, मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि मैं और मेरे साथ काम करने वाले लोग खुद को भारत के लोगों का सेवक मानते हैं. अपने प्रयासों, कष्टों और बलिदान के लिए हम केवल एक ही पुरस्कार जीतना चाहते हैं और वो है भारत की आजादी. एक बार भारत आजाद हो जाए तो हममे से ऐसे बहुत से लोग हैं जो राजनीति से संन्यास लेना चाहेंगे. बाकि बचे लोग आजाद भारत में कोई भी पद, चाहे कितना ही छोटा क्यों ना हो, स्वीकार करने में संतोष का अनुभव करेंगे.
भारत की आजादी की अंतिम लड़ाई शुरू हो चुकी है. आजाद हिंद फौज के लोग बहादुरी से लड़ रहे हं. वो लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं. ये सशस्त्र संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक कि अंतिम अंग्रेज को भारत से नहीं निकाल दिया जाता. जब तक नई दिल्ली के वायसराय हाउस पर हमारा तिरंगा गर्व से लहराने नहीं लगता.
हमारे राष्ट्रपिता, भारत की स्वतंत्रता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और आपकी शुभकामनाएं मांगते हैं.
दूसरी तरफ 4 फरवरी, 1939 को ‘यंग इंडिया’ में गांधी जी लिखते हैं, ‘…तो भी मैं उनकी (सुभाष बाबू की) विजय से खुश हूं और चूंकि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा अपना नाम वापस ले लेने के बाद डॉ पट्टाभि को चुनाव से पीछे न हटने की सलाह मैंने दी थी, इसलिए यह हार उनसे ज्यादा मेरी है.’
गांधी जी आगे लिखते हैं, ‘इस हार से मैं खुश हूं….सुभाष बाबू अब उन लोगों की कृपा के सहारे अध्यक्ष नहीं बने हैं जिन्हें अल्पमत गुट वाले लोग दक्षिणपंथी कहते हैं, बल्कि चुनाव में जीतकर अध्यक्ष बने हैं. इससे वे अपने ही समान विचार वाली कार्य-समिति चुन सकते हैं और बिना किसी बाधा या अड़चन के अपना कार्यक्रम अमल में ला सकते हैं. …सुभाष बाबू देश के दुश्मन तो हैं नहीं. उन्होंने उसके लिए कष्ट सहन किए हैं. उनकी राय में उनका कार्यक्रम और उनकी नीति दोनों अत्यंत अग्रगामी हैं. अल्पमत के लोग उसकी सफलता ही चाहेंगे.
27 अप्रैल, 1947 को आजाद हिन्द फौज के लोगो को संबोधित करते हुए गांधीजी ने कहा था, ‘आजाद हिन्द फौज का नाम अहिंसक आजाद हिन्द फौज रखना चाहिए न? (हंसते-हंसते), क्योंकि मुझसे आप कोई दूसरी बात नहीं सुन सकेंगे. सुभाष बाबू तो मेरे पुत्र के समान थे. उनके और मेरे विचारों में भले ही अंतर रहा हो, लेकिन उनकी कार्यशक्ति और देशप्रेम के लिए मेरा सिर उनके सामने झुकता है.’
Author Shivendra Sriwastav
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