nregs केरल के बहुत से गांव कोरोना (Coronavirus) की वजह से कंटेनमेंट जोन में बदल गए हैं। इसके बावजूद पिछले हफ्ते रोजाना 6 लाख लोगों ने मनरेगा (mnrega) का काम किया। वहीं कुछ हफ्ते पहले यह आंकड़ा 6.4 लाख था। पिछले मॉनसून में औसत उपस्थिति 5 से 5.5 लाख ही थी।

Edited By Sudhakar Singh | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

घर लौटे प्रवासी मजदूरों का सहारा बनेगी मनरेगा
हाइलाइट्स

  • केरल में कोरोना के बीच युवाओं का ठिकाना बना मनरेगा
  • ग्रैजुएट से लेकर इंजिनियर तक सभी जुड़ रहे हैं योजना से
  • पिछले हफ्ते मनरेगा के तहत 6 लाख उपस्थिति दर्ज हुई है
  • पिछले मॉनसून के दौरान यह आंकड़ा 5 से 5.5 लाख ही था

तिरुवनंतपुरम

कोरोना खतरे के बीच मजदूरों और कामगारों को पलायन करना पड़ा है। बहुत से लोगों को रोजगार के लिए नया रास्ता तलाशना पड़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा योजना (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम) काफी कारगर साबित हो रही है। इन सबके बीच केरल में पिछले हफ्ते एक इंजिनियर ने मनरेगा योजना में काम शुरू किया है।

पथानामथिट्टा जिले के एक गांव में ऑटोमोबाइल इंजिनियर कृष्णकुमार केपी को काम मिला। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 23 साल के इंजिनियर की नौकरी चली गई थी। वह कहते हैं कि यह इकलौता काम है जो अभी मिल सकता है। कृष्णकुमार अभी पौधे लगाने का काम कर रहे हैं। वहीं अधिकारियों के मुताबिक कोझिकोड जिले के अझियूर गांव में पांच ग्रैजुएट ने भी मनरेगा के तहत काम के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। ऐसा पहली बार है कि यहां पुरुषों ने मनरेगा के लिए आवेदन किया है। इस पंचायत के 1537 मजदूरों में सभी महिलाएं थीं।

कासरगोड के बेडडका पंचायत के प्रमुख सी रामचंद्रन कहते हैं कि जिन युवाओं की नौकरियां चली गई हैं, उनको मनरेगा में नामांकन कराने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। यहां चार युवाओं ने मनरेगा का काम शुरू किया है। केरल के इस गांव में मनरेगा को ज्यादा उम्रदराज महिलाओं के लिए उम्मीद की आखिरी किरण माना जाता है। कोरोना संकट के दौरान पिछले चार महीने से घरों में पैसे की किल्लत है। शहरों में नौकरी नहीं है। ऐसे में मनरेगा स्कीम पढ़े-लिखे युवाओं के लिए भी लाइफलाइन बन गई है।

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राज्य में मनरेगा से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि हाल के दिनों में एक नया ट्रेंड देखने को मिला है। आम तौर पर 91 फीसदी कामगार महिलाएं (40 साल से ऊपर) रहती थीं। अब बहुत से युवक और युवतियों ने स्कीम के तहत काम शुरू कर दिया है। उनमें से बहुत ने अपने मां या परिजनों के नाम पर जारी जॉब कार्ड के जरिए नामांकन कराया है।

अधिकारियों का कहना है कि पिछले दो महीनों के दौरान 30 हजार से ज्यादा नए परिवारों को स्कीम में शामिल किया गया है। इसके बावजूद अभी सभी जिलों से मनरेगा जॉब कार्ड की डिमांड आ रही है। राज्य के आंकड़ों के मुताबिक बहुत से गांव कोरोना की वजह से कंटेनमेंट जोन में बदल गए हैं लेकिन इसके बावजूद पिछले हफ्ते रोजाना 6 लाख लोगों ने मनरेगा का काम किया। वहीं कुछ हफ्ते पहले यह आंकड़ा 6.4 लाख था। पिछले मॉनसून में औसत उपस्थिति 5 से 5.5 लाख ही थी।

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एक स्थानीय कॉलेज से इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर चुके कृष्णकुमार कहते हैं कि उनके गांव में बहुत से युवाओं इस स्कीम में काम नहीं करना चाहते थे क्योंकि इसे उम्रदराज महिलाओं के काम से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन अब मैंने फैसला किया है कि जब तक मुझे दूसरी नौकरी नहीं मिलती है, तब तक मैंने मनरेगा में ही काम करूंगा। पथानामथिट्टा के ही के बिबिन (23) कोच्चि की एक फाइनैंशल फर्म में काम करते थे। वह कहते हैं कि मैंने अपने खाते में 12 दिन का काम दर्ज करवा लिया है। मुझे चार दिन के काम का रोजाना 291 रुपये के हिसाब से भुगतान भी हो चुका है। अब मेरे मित्र भी इससे जुड़ने को उत्सुक हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

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Web Title nregs in kerala engineer to graduate youths new job is mnrega worker(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)

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