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दो दिन पहले मोदी सरकार ने फौज में भर्ती करने के लिये नयी योजना अग्निपथ को लांच किया। इस योजना के आने की आहट कई महीनों से सुनायी दे रही थी। लेकिन भर्तियों की घोषणा सरकार ने अब की। इस योजना की विधिवत घोषणा होने से इसके गुण दोष सार्वजनिक हो गये हैं। सरकार और भाजपा इस योजना के गुणगान करते नहीं थक रहे वहीं दूसरी ओर सेना में भर्ती होने को इच्छुक लोग इसे अपनी जिंदगी से खिलवाड़ बता रहे हैं। दो दिनों से देश के अनेक हिस्सों से इस योजना के विरोध की घटनाएं समाचारों देखने और सुनने में आ रही हैं। सबसे ज्यादा आगजनी प्रभावित तो बिहार दिख रहा है, जहा प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने कई रेल गाड़ियों और स्टेशनों में पथराव और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया है। बिहार में क्षुब्ध प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी विधायकों, सांसदों व नेताओं के घरों व कार्यालयों पर भी अपना गुस्सा निकाला है। ऐसे में बिहार की मुख्य पार्टी जेडीयू ने केन्द्र से इस योजना पर एक बार फिर विचार करने का अनुरोध किया है। मोदी सरकार ने अपने मंत्रियों सांसदों और पार्टी प्रवक्ताओं को योजना के प्रचार प्रसार के लिये तैनात कर दिया है। ये सब मिलकर अग्निपथ योजना की विशेषताओं को टीवी चैनलों में बैठकर तारीफें कर रहे हैं। यहां तक कि सेना के अध्यक्षों को भी सरकार ने बचाव पक्ष में उतारा और उनकी प्रेसवार्ता कर अपनी बात पुख्ता करने करने का प्रयास किया है। इससे नहीं लगता कि वो इतनी आसानी से इस भर्ती अभियान में कोई विशेष बदलाव करने वाली है। लग रहा है कि इससे पहले किसानों ने एक सवा साल तक तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन किया था अब देश का बेरोजगार युवा इस अग्निपथ फौज भर्ती अभियान का विरोध करने पर मजबूर हो जायेगा।
आखिर फौज के इस भर्ती अभियान का इतना विरोध क्यों हो रहा है। इस पर गौर करने से पता चलता है कि पिछले दो सालों से फौज में कोई भर्ती नहीं की गयी है। अब जब भर्ती का समय आया तो नियम कायदों में काफी बदलाव कर दिया गया है। सबसे पहले तो इसकी अधिकतम आयु को लेकर विवाद हुआ। इस भर्ती अभियान में केवल 17 से 21 तक के युवाओं को ही लिया जाना था। जब काफी विरोध हुआ तो सरकार ने भर्ती के लिये उम्र 21 से बढ़ा कर 23 कर दिया उस पर यह शर्त लगा दी कि यह केवल पहले भर्ती के दौरान ही लागू होगा। लेकिन प्रदर्शनकारी लोगों ने सरकार की इस दरियादिली को नकार दिया और कहा भर्ती को पुराने नियम कायदों के समान किया जाये। यानि चार साल की जगह 15 साल की नौकरी, ग्रेच्यूटी और पेंशन लागू की जायें। प्रदर्शनकारी इस बात से नाराज हैं कि रंगरूट की पेंशन और ग्रेच्यूटी पर सरकार की नजर हैं जो फैज का सबसे अहम् हिस्सा होता है लेकिन वहीं सरकार अधिकारियों और सेना के अन्य उच्चाधिकारियों की सेवा में कोई कटौती नहीं कर रही। देश अफसरों और जनरलों के वेतन और भत्ते उठाने में सशक्त है लेकिन फौजियों की सैलरी और भत्तों को उठाने में सरकार का खजाना खाली है।
दिलचस्प बात यह है कि यदि किसी पार्टी का कार्यकर्ता या नेता पार्षद बनता है उसे सरकार की पेंशन देने की बात सही है अगर वहीं नेता विधायक और सांसद बना तो उसे एक नहीं तीन पेंशन देने का प्रावधान है वहीं फौजी की पेंशन देने को सरकार का दम निकल रहा है।








