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पुलिस ने मामले की रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की
सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के वायरल वीडियो को देखते हुए कहा कि ऐसी घिनौनी वारदात से हम जजेस भी काफी परेशान और चिंितत और विचलित हैं उन्होंने केन्द्र सरकार को यह नोटिस दिया कि सात दिनों के अंदर वो मणिपुर मामले में कार्रवाई करें अथवा हम कार्रवाई करेंगे। यह नोटिस 21 जुलाई को सीजेआई ने दिया था। 18 जुलाई को यह वायरल वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया। इसके बाद ही देश ही नहीं बल्कि विदेशों में चर्चा में आ गया। आज 12-13 दिन हो गये हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कुछ सामान्य से सवाल पूछे जो कोई भी आम आदमी भी पूछ सकता है। मसलन पुलिस ने मामले की रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की। जबकि यह वारदात 3 मई की रात को हुई थी। कुल कितने मामले हत्या, रेप और आगजनी की वारदातों में दर्ज किये गये हैं


देश की जनता को सुप्रीम कोर्ट से ही उम्मीद थी। वो टकटकी लगा कर 28 जुलाई का इंतजार कर रही थी। लेकिन जनता को सुप्रीम कोर्ट से निराशा हाथ लगी। सीजेआई सिर्फ केन्द्र सरकार की दलीलें ही सुन रहे हैं। यह बात और है कि सीजेआई मणिपुर मामले में रोज सुनवायी कर रहे हैं। लेकिन सीजेआई से जिस सख्त कदम की आस जनता और मणिुपर की जनता कर रही थी, वो देखने को नहीं मिली है। सीजेआई ने सरकार को साफ कह दिया है कि मामले में वो सोमवार को निर्देश जारी करेंगे। वैसे सीजेआई इस बात से नाराज हैं कि केन्द्र सरकार ने सीएम एन बीरेंद्र सिंह से अभी तक इस्तीफा क्यों नहीं मांगा। मणिपुर में जो भयानक व डरावने हालात हैं उसके लिये मणिपुर सरकार के साथ मोदी सरकार भी उतनी जिम्ेमदार है जितनी बीरेंद्र सिंह की सरकार बिगड़ते हालातों को काबू पाने के लिये गृह मंत्रालय ने क्या किया किया इस बात पर केन्द्र सरकार और अमित शाह गोल गोल घुमाने की कोशिश कर रहे हैं।
केन्द्र सरकार की ओर एसजी तुषार मेंहता ने सीजेआई के सवालों का जवाब देने का प्रयास किया और जो जानकारी मांगी जा रही हैं इतने कम समय में मुमकिन नहीं है। इस सीजेआई डीवाई चंद्रचूड ने कहा कि अब केन्द्र व प्रदेश सरकार को समय नहीं दिया जा सकता। हिंसा और रेप केसों के सुबूत मिटाये जा सकते है। सरकारों ने इतने दिनों में हालात सुधारने का प्रयास नहीं किया। इस माममें सरकार और पुलिस की कमियां और लापरवाही अक्षम्य हैं।
यह मामला भी 18 मई को जीरो रिपोर्ट दर्ज कराया गया। मणिपुर पुलिस का इतना कहर था कि कोई भी पीड़ित केस दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। पुलिस की निष्क्रियता व लापरवाही साफ दिखायी दे रही है। वहां की सरकार का काम काज भी पूरी तरह विफल रहा है। मामलों से निपटने में प्रदेश सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। कहीं भी व्यवस्था को सुधारने की सरकार ने कोशिश नहीं की। केन्द्र्र की मोदी सरकार खासतौर से गृहमंत्रालय की विफलता के कारण मणिपुर आज भी दंगों की चपेट में है। दंगाइयों के पास इतने आधुनिक हथियार कहां से आये। प्रदेश में लॉ एण्ड आर्डर बिल्कुल ध्वस्त हो चुका है। प्रदेशवासियों को प्रदेश की भाजपा सरकार पर कतई विश्वास नहीं रहा हैं। अगर पड़ोसी देशों से आ रहे थे तो इंटेलिजंस विभाग क्या कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट मानता है कि मणिपुर के नरक बनने में केन्द्र की मोदी और सीएम एन बीरेंद्र सिंह पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।
हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद हालात बिगड़े
केन्द्र व प्रदेश सरकार मामले की गंभीरता को कम करने के लिये अब हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को जिम्मेदार मान रहे हैं जिसमे कोर्ट ने मैतई समुदाय के लोगों को आरक्षण देने की बात कही थी। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि सरकार को जब यह मालूम था उसने हालात से निपटने को इंतजाम क्यों नहीं किये। मामले की गंभीरता को सरकार ने बहुत हल्के में लिया। यह कहा जा रहा है कि इस टिप्पणी से मैतई समुदाय के लोगो को अनसूचित जाति में आरक्षण मिलने वाला था। कूकी और जनजातीय समुदाय को पहले से ही आरक्षण मिल रहा था।
सीएम ने कूकी समुदाय के साथ किया सौतेला बर्ताव
सीएम बीेरेंद्र सिंह मैतई समाज से आते हैं और उनका पूरा प्रयास था कि मैतई समुदाय को आरक्षण मिले। इसके अलावा बीरेंद्र सिंह मैतई समुदाय के पक्ष साफ साफ खड़े दिख रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ हाई कोर्ट की ये टिप्पणी रास नहीं आ रही है। इस बात को लेकर पिछली तीन माह से दोनों समुदाय के बीच खूनी संघर्ष चल रहा है। इस मामले को सुलझाने के लिये न तो केन्द्र सरकार ने कोई प्रयास किया और न ही बीरेंद्र सिंह सरकार ने। इस खूनी संघर्ष के चलते 150 से अधिक लोगों को जान खोनी पड़ी हैं। सैकड़ो महिलाओं की बर्बरता से आबरू लूटी गयी। प्रदेश सरकार और मणिपुर पुलिस ने इन पर लगाम कसने की कोई कोशिश नहीं की और मणिपुर कई महीनों से नफरत और हिंसा की आग में सुलग को मजबूर है।








