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26 जुलाई को अखिरकार सीएम बीएस येददू्रपपा ने सीएम पद से इस्तीफा दे ही दिया। आखिरी समय तक मोदी, शाह और नड्डा ने बीएस की तारीफों के पुल बांधे। वो इस लिये कि कहीं वो अपने वादे से मुकर न जायें। 78 साल के सीएम ने पद संभालते समय बीजेपी नेतृत्व से यह वादा किया था कि सरकार के दो साल के कार्यकाल के बाद वो सीएम पद से इस्तीफा दे देंगे। येदृदूरप्पा ने अपना वादा निभा दिया। येदृदूरपपा ही एकमात्र नेता हैं जिन्हें भाजपा ने सारे सिद्धांत ताक पर रख कर्नाटक का मुख्यमंत्र.ी बनाया है। इसे बीएम का दबाव भी माना जा सकता है।
इससे पहले भी केन्द्रीय नेतृत्व ने शिकायत मिलने पर बीएस से कहा कि वो अन्य विभागों के मंत्रियों के कार्यप्रणली में हस्तक्षेप करना बंद करें। यह भी सनने में आया था कि सीएम के बेटे अन्य विभागों में दबाव डालते है। लेकिन बीएस ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। आने वाले चुनाव को देखते हुए बीजेपी को लगा कि सीएम नहीं बदला तो प्रदेश की सत्ता हाथों से निकल सकती है। बीएस वैसे भी अपनी अकड़ और हठ के लिये जाने जाते हैं। इससे पहले भी वो भाजपा छोड़ कर अपनी कर्नाटक जनता पार्टी बना चुके है। इससे भाजपा को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। बीएस को भी विशेष फायदा नहीं हुबा और उन्होंने भाजपा में जाना ठीक समझा। इसका उन्हें भी फायदा नहीं मिला। 2019 में भाजपा ने तोड़ फोड़ कर कांग्रेस और जेडीएस के लगभग 2 दर्जन विधायाकों को बागी बनने पर मजबूर किया और भाजपा में शामिल कर एक बार फिर सत्ता पाने में सफल रहे।

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