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रात भर नारद सुक्खू किसान के झोपड़े के बाहर खड़े रहे। पूरी रात गुजर गयी। नारद ने पूरी रात जाग कर काटी वो नहीं चाहते थे कि किसान की कोई गतिविधि उनसे छूटे। सुबह भोर होने के साथ साथ सुक्खू अपनी दैनिक गतिविधियों में जुट गया। सुबह होते ही उसने हरि का नाम लिया और काम में जुट गया। खेत जाने से पहले उसने स्नान किया और रूखा सूखा खा कर खेत चला गया। वहां उसने खेत में कड़ी मेहनत की और दोपहर तक काम किया। उसके बाद वो वापस अपने झोपड़ी में आ गया। खाना खाने से पहले उसने भगवान का नाम लिया और भोजन कर लिया। कुछ देर तक उसने झोपड़ी में आराम किया। पांच बजे के लगभग वो फिर से खेत में काम करने गया।
दो तीन घंटे काम करने के बाद वो वापस अपनी झोपड़ी में लौट आया। उसने हाथ पैर धो कर अपने लिये खाना बनाया। उसके बाद हरि का नाम लिया और भोजन कर लिया। कुछ देर बाद उसने भगवान का नाम लिया और सोने की तैयारी कर ली। कुछ देर बाद ही चैन से सो गया। इधर नारद किसान की झोपड़ी के बाहर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्हें श्रीहरि के ऊपर बड़ ही क्रोध आया कि 24 घंटों में तीन चार बार भगवन का नाम लेने वाला किसान उनका सबसे प्रिय और बड़ा भक्त बन गया और यहां मैं दिन भर उनके नाम की माला जपता हूं फिर भी उनका प्रिय भक्त नहीं बन पाया। इसी उधेड़बुन में वो स्वर्गलोक की ओर चल दिये। देवऋर्षि थे सो जल्द ही वो श्रीहरि के पास पहुचने को आतुर थे।
वो चाह रहे थे कि जितनी जल्दी वो विष्णू जी क पास पहुंचंें और अपनी भड़ास निकालें। जल्द ही वो श्रीहर के समक्ष प्रस्तुत हो गये। उसे विष्णू जी क्षीर सागर में आराम कर रहे थे। नारद को देख श्री हरि ने मुस्कराकर कहा-़ऋषि वर आप क्या भूलोक कब आना हुआ।
नारद ने कहा प्रभु बस अभी अभी सीधा वहीं से आ रहा हूं। सीधा आपके पास आ रहा हूं।
श्री हरि ने कहा- कैसा रहा आपका भूलोक पर्यटन!
नारद- भगवन आप कहते हैं कि सुक्खू आप का सबसे प्रिय व बड़ा भक्त है लेकिन वो तो 24 घंटों में केवल तीन या चार बार नाम लेता है वो कैसे आपका सबसे बड़ा भक्त हो गया।
विष्णू जी समझ गये कि नारद सुक्खू किसान को लेकर काफी तनाव में हैं। उन्होंने ऋषिवर की मनोदशा को समझ कर कहा-आप तो देवऋर्षि हैं आपको केवल स्वर्गलोक के बारे में चिंता करनी चाहिये। आप हैं कि व्यर्थ की चिंता में घुले जा रहे हैं।
लेकिन नारद तो केवल इस बात के लिये परेशान थे कि सुक्खू श्री हरि का सबसे प्रिय और बड़ा भक्त कैसे हो सकता है। विष्णू भगवान ने सोचा नारद की इस समस्या का निदान करना ही होगा।
उन्होंने कहा-देवऋर्षि आप का मानना है कि पूरेे ब्रह्मांड में आप सबसे ज्यादा मेरी भक्ति करते हैं। मेरे नाम की माला जपते हैं।
नारद ने तपाक से कहा-इसमे कोई शक नहीं। मैं ही आपका सबसे प्रिय और बड़ा भक्त होने का पात्र हूं।
श्रीहरि ने कहा चलिये आप मैं आपको एक काम सौप रहा हूं। अगर आप उस कार्य को कुशलता पूर्वक कर लेते हैं तो मैं भी मान जाऊंगा कि आप मेरे सबसे प्रिय और बड़े भक्त हैं।
नारद ने तत्परता से कहा-भगवन आप की आज्ञा सिर आंखों पर। जल्दी से मुझे काम बतायें। मैं उसे जल्द से जल्द संपन्न करना चाहता हूं।
श्री हरि ने कहा- काम बहुत ही साधारण सा है आपको ब्रह्मांड के सात चक्कर लगाने होंगे।
नारद ने तपाक से कहा – बस भगवन इतना आसान काम तो मैं चुटकी बजाते हुए कर दूंगा।
श्री हरि ने नारद को बीच में ही टोकते हुए कहा-ऋषिवर मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है पूरी बात तो सुन लें। फिर अपनी बात कहंे। दुनिया के चक्कर लगाते समय आपके दोनों हाथों मे ंतेल से लबालब भरे दो कटोरे होंगे। याद रहे कटोरों का तेल एक भी बूंद गिरना नहीं चाहिये।
नारद ने कुछ सोचे बिना हां कर दी। इसके साथ वो दुनिया के सात चक्कर लगाने के लिये तत्पर हो गये। दोनों हाथों में तेल से भरे कटोरे रख कर रवाना हो गये। उनका पूर दिमाग विष्णू जी की इस बात पर लगा हुआ था कि तेल की एक भी बूंद गिरनी नहीं चाहिये। पूरी तन्मयता से वो दुनिया के चक्कर लगाने में जुटे हुए थे। एक एक करके उन्होंने दुनिया के सातों चक्कर लगाये। इसके बाद वो श्रीहरि के समक्ष पेश हो गये।
श्रीहरि ने नारद को देखा और मुसकाये। उन्होंने कहा-देवऋषि दुनिया के सातों चक्कर पूरे हो गये।
नारद ने कहा-जी भगवन। देखिये दुनिया के सात चक्कर भी लगा लिये और कटोरों का एक भी बूंद तेल भी नहीं गिरा। पूरे लबा लब भरे हुए हैं।
श्री हरि ने मुसकराते हुए पूछा-दुनिया के सातों चक्कर लगाते हुए आप ने कितनी बार मेरा नाम लिया।
नरद जी इस बात पर सकुचाये और बोले-प्रभु इस बीच मैं का नाम लेना भूल गया क्यों कि सारा ध्यान तो तेल के कटोरों पर था कि एक भी बूंद गिराना नहीं था इसलिये आपका नाम मैं नहीं ले सका।
नारायण ने नारद को पास बुलाया और कहा यही अंतर है आप में और गरीब किसान सुक्खू में वो दिन भर कड़ी मेहनत करता है लेकिन मेरा नाम लेना नहीं भूलता है। दूसरी ओर आप हैं कि एक जरा सा काम करने के दौरान मुझे ही भूल गये। अब आप को समझ में आ गया होगा कि सुक्खू मेरा परम प्रिय और सबसे बड़ा भक्त क्यों है।
नारद मुनि को अपनी गलती का एहसास हो गया कि वो क्या गलती कर रहे थे। उन्होंने श्रीहरि से अपनी इस अबोध गलती के लिये क्षमा मांगी और नारायण नारायण करते हुए विचरण को निकल गये।








