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मैं इस बात की फिक्र नहीं करता कि मेरे बारे में क्या सोचता
इस साल के जून माह में मेरे बड़े बेटे ने यह प्लान किया कि हम सब मिलकर वैष्णो देवी चलते हैं। यह बात तीन चार माह पहले तय हो गयी कि वो इस बार अपने बेटे शिवांश को जन्मदिन वैष्णो माता के दर्शन कर मनायेंगे। उनका यह ट्रिप पूरी तह धार्मिक था। लेकिन मेरे लिये यह पूरी तरह से एडवेंचरस जर्नी थी। मैं बहुत ज्यादा धार्मिक प्रवृत्ति का नहीं हूूं मेरे जीवन में धर्म का महत्व सिर्फ उतना है जितना खाने में नमक का। शायद यह बात कुछ लोगों को अटपटी लगे। लेकिन मैं इस बात की फिक्र नहीं करता कि मेरे बारे में क्या सोचता है। यात्रा का अनुभव मेरे लिये अविस्मरणीय है। लोगों को इस बात की खुशी थी कि उनकी मनोकामना पूरी हो गयी। लेकिन जहां तक मेरी बात थी मुझे इस बात की खुशी थी कि मै ऐसी जगह घूमने आया जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। वहां का मौसम,आबो हवा और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण नजारे। सब कुछ दिल को अजीब सा सुकून प्रदान कर रहे थे।
आराम से कटा ट्रेन का सफर
16 जून की रात को हम सब जम्मू जाने के लिये ट्रेन में रोहिल्ला सराय से सवार हुए। हम लोग यानि पत्नी और छोटा बेटा बड़े बेटे के घर पर पहुंच गये। वहां से सात साढ़े सात बजे मेट्रो से रेलवे स्टेशन को निकले। हमारे साथ बड़े बेटे का परिवार यानि पत्नी और बेटा था। इसके अलावा बेटे के ससुराल का एक सदस्य भी साथ चल रहा थे। जैसे ही हम लोग मैट्रो स्टेशन पहुंचे कि बड़े बेटे के दोस्त का फोन आ गया कि उसके पास लिफ्ट की चाबी रह गयी है। अगर खराब होती तो वहां के लोगों को काफी दिक्कतें उठानी पड़ सकती थी। यह तय हुआ कि वो घर जाकर घर से चाबी निकाल कर दूसरे को दी जाये। परेशानी वाली बात यह थी कि स्टेशन जाने का रास्ता सिर्फ बेटे को ही मालूम था। जब तक वो वापस नही आता तब तक हम लोग सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन नहीं पहुंच सकत थे। मेट्रो से हम वहां तक पहुंच गये जहां से हम लोगों को आटो कर के रेलवे स्टेशन पहुंचना था। हम लोगों ने दो बैट्री रिक्शा कर लिये और रेलवे स्टेशन के लिये चल दिये। वहां पहुंचते पहुंचते 10.20 हो चुके थे। ट्रेन चलने का टाइम 10.40 था। हम सभी लोग स्टेशन पर पहुंच कर बेटे को देख रहे थे कि वो सामने से आता दिख गया। हम लोगों ने ट्रेन पकड़ने के लिये दौड़ लगा दी। सबसे ज्यादा परेशानी मेरे लिये थी। सब लोगों को चिंता थी कि दौड़ते समय मैं गिर न जाऊं। खैर ऐसा कुछ हुआ नहीं सब लोग ट्रेन छूटने से पहले प्लेटफार्म पर खड़ी गाड़ी में बैठ गये थे। अब चिंता की कोई बात नहीं थी। 10—15 मिनट बाद ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड दिया था। अब तक हम सभी लोग बर्थ पर सेट हो गये थे।
मौज मस्ती करते हुए हम लोग जम्मू के लिये रवाना हुए
कुल मिला कर हम छह लोगों की टीम वैष्णो देवी के दर्शन करने जा रहे थे। बैटे बहू का वहां अपने बेटे का जन्मदिन मनाने का भी प्लान था। बहू इसके लिये काफी उत्साहित थी। इस बात की सबको खुशी थी कि शिवांश का दूसरा जन्मदिन इतनी रमणीक स्थल पर मनाने का अवसर मिल रहा है। ट्रेन साढ़े दस बजे अपने नियत समय से चल दी। इस ट्रेन की खूबी थी कि ये सिर्फ एक या दो स्टाप थे। ट्रेन चलने के कुछ देर बाद यह तय हुआ कि अब खाना खा लिया जाये। घर से ही बहू और सास ने मिलकर रास्ते के लिये काफी सारा खाना बना लिया था। छह लोगों के हिसाब से काफी सब्जी और पूरियां बना कर लाये थे। इसके अलावा बड़ा बेटा रास्ते के लिये चिप्स कोल्ड्रिंक और बिस्किट भी लाया था। कुछ देर बाद सबने खाना शुरू कर दिया था। सभी लोगों को काफी तेज भूख लगी थी। सबने खाना खा कर बाकी खाने को समेट कर रख दिया। मेरे को छोड़ सबने खाना खाया था। मैंने शाम सात बजे ही खाना खाना था। इसलिये भूख नही थी। वैसे भी डायबिटिक होने की वजह से मैं खाना बहुत ही नपा तुला खाता था। मैं पूरी सब्जी खाने से परहेेज ही करता हूं। लगभग 12 बजे तक सभी लोग अपनी अपनी बर्थ पर सेट हो गये थे। पत्नी और बड़ा बेटा बा
त चीत कर रहे थे। मेरी आंख लगभग 5 बजे ही खुल गयी थी। मैं चूंकि खिड़की के पास बैठा था इसलिये वहां से प्राकृतिक नजारे देख रहा था। जैसे ही ट्रेन ने पंजाब क्रास किया और जम्मू की सीमा में प्रवेश किया वैसे ही एक अजीब सी खुशी का अहसास होने लगा। वहां की हवा में एक अजब सा नशा था। लग रहा था कि जैसा सुना था उससे कहीं ज्यादा खुशी और सुकून मिल रहा था। प्राकृतिक नजारों से दिल बाग बाग हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी और भी दुनिया आ गये हैं। जहां सिर्फ शांति और सुकून ही सुकून महसूस हो रहा था। तब तक पत्नी की आंख भी खुल गयी थी। दोनों बैठ कर जम्मू के नजारे लेने लगे।
….शेष अगली कड़ी में








