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बात उन दिनो की है
बात उन दिनों की है जब हम लोग सातवीं आठवीं कक्षा में पढ़ते थे। उन दिनों फिल्म का बड़ा शौक था। लेकिन घर से इतने पैसे नहीं मिलते थे कि पिक्चर देख सकते थे। बस फिल्मों के पोस्टर देख कर ही मन शांत कर लेते थे। उन दिनों जब भी कोई नयी फिल्म सिनेमा हाल्स में लगती उसके प्रचार के लिये कार या साइकिल रिक्शा पर पोस्टर लगाया जाता था। कार तो प्रमुख सड़कों पर घूम घूम कर प्रचार करती वहीं रिक्शा गली गली मोहल्ले मोहल्ले में घूम कर प्रचार किया करता था। सभी बच्चे उस रिक्शे के आस पास जमा हो जाते थे। पोस्टर देख कर पता चलता कि इस नयी पिक्चर में कौन कौन सा हीरो हीरोइन काम कर रही है। मेन विलेन कौन है। निर्माता निदेशक से उन दिनों हम लोगों को कोई लेना देना नहीं होता था।
हम लोगों को दशहरे का इंतजार रहता था। उन दिनों हम लोग रामलीला देखने के बहाने देर रात तक घर के बाहर घूमने जा सकते थे। हमारे घर से छोटा भाई बिल्लू और बड़ी बहन शाम होते होते घर से रामलीला जाने के लिये तैयार हो जाते थे। घर से ही बैठने को टाट की बोरी ले जानी पड़ती थी। उन दिनों रामलीला मंच के पास बैठने का शौक था। हमारे ब्लाक से लगभग एक दर्जन बच्चे रामलीला देखने को सेंटर पार्क जाया करते थे। रामलीला का मंचन लगभग साढ़े आठ बजे शुरू होता था लेकिन हम सभी लोग सात बजे से ही लीला स्थल पर पहुंच जाते थे। क्यों कि देर से पहुंचने पर आगे की जगह घिर जाती थी। हम लोगों को काफी पीछे बैठने को मिलता था। हम चार छह लड़कों का ग्रुप था जो रामलीला देखने के बहाने फिल्म देखने का शौक पूरा करते थे। उनमें हम और बिल्लू भी शामिल थे।
एक बार की बात है कि हम लोग रामलीला देखने को कह के सेंटर पार्क पहुंचे। वहां पहुंच कर यह प्लान बना कि आज न्यू बसंत सिनेमा हाल में राहु केतू फिल्म आज से लगी है। पांच छह लड़कों के ग्रुप ने तय किया कि आज नाइट शो देखने जाना है। हमेशा की तरह मेरी टिकट के पैसों का इंतजाम बिल्लू को ही करना था। मेरे पास पैसे होने का सवाल ही नहीं उठता था। चूंकि बिल्लू पापा के साथ बिजनेस करता था। 10 पंद्रह रुपये का इंतजाम करना उसके लिये कोई बड़ाी बात नहीं थी। वैसे भी वो खर्च करने में काफी खुला था। बाकी सब ने भी अपने अपनी टिकट के पैसों का हिसाब किताब लगाया और इंतजाम होने पर यह तय हुआ कि नौ बजे तक हमें घर के अन्य सदस्यों की बीच रह कर यह एहसास दिलाना है कि हम सब उनके साथ रामलीला ही देख रहे हैं। उसके बाद ही हम सिनेमा हाल के लिये निकलना होगा। चूंकि सिनेमा हाल वहां से लगभग पांच किमी दूर था। इसलिये वहां शो शुरू होने से पहले पहुंचना भी जरूरी था। प्लान के हिसाब हम लोग ठीक नौ बजे सेंटर पार्क से निकल लिये। न्यू बसंत टाकीज पहंुचने के लिये हम लोगों ने दौड़ लगाना शुरू कर दिया। बीस पच्चीस मिनट की लगातार दौड़ से हम लोग साढ़े नौ बजे से ठीक पहले सिनेमा हाल की टिकट विंडो के पास पहुंच गये।
हम लोगों ने चैन की सांस ली कि चलो सिनेमा शुरू होने से पहले ही हम लोग पहंुच गये वर्ना फिल्म अध्ूारी देखने को मिलती। हम लोग जल्दी से टिकट लेकर सिनेमा हॉल के अंदर अपनी अपनी सीट पर जा बैठे। उस समय हम लोग सबसे आगे की सीट वाली ही टिकट खरीद पाते थे। हम लोग आगे की सभ्ट पर कर फिल्म शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। स्क्रीन पर विज्ञापन चल रहे थे। अचानक फिल्म शुरू होने की घंटी बज गयी। हम चुपचाप बैठ कर फिल्म देखने लगे। उस समय हम लोगों को फिल्म में लड़ाई मारधाड़ ही देखनी होती थी। इस फिल्म में मारधाड़ भरपूर थी। हम लोग इसका मजा ले रहे थे। इस बीच में इंटरवल की घंटी बज गयी हम सब लोग अपनी सीट पर ही बैठे रहे।
अचानक मैंने कहा कि बाथरूम हो कर आता हूं। वहां से निकल कर वाशरूम गया। वहां से निकलने के बाद मैं थियेटर के आगे के हिस्से में पहुंच गया वहां मैं फिल्म के पोस्टर देखने लगा। यह देखने के लिये कि आगे कौन कौन से सीन बाकी हैं। मैं इसी धुन में लगा था कि मेरी निगाह सामने पड़ी मैंने देखा कि वहां पापा भी खड़े थे। मेरे तो हाथ पांव फूल गये। उनसे निगाहें बचा कर मैं किसी तरह सिनेमा हाल के अंदर अपनी सीट पर पहुंच गया। वहां जा कर सबसे पहले बिल्लू को बताया कि पापा भी इसी सिनेमा हाल में आये हैं। उसके भी होश उउ़ गये जैसे ही इस बात का पता अन्य लड़कों को हुआ उनके चेहरे का रंग उड़ गया। सब के सब बगलें झांकने लगे। उन्हें डर था कि चाचा जी ने अगर उन्हें देख लिया तो उनके घरों में भी ठकाई हो सकती थी। अब सब का मन पिक्चर देखने में नहीं लग रहा था। हम लोग वैसे भी सबसे आगे की सीटों पर बैठे थे। इसलिये यह प्लान बनाया कि जैसे ही फिल्म खत्म होगी सबसे पहले गेट पार कर घर की ओर दौड़ लगा देंगे। इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। हमारे साथ तो एक और ट्रेजिडी थी। बिल्लू पापा को तहमद बांध कर चला आया था। पापा घर पर पहुंच कर सबसे पहले तहमद ही पहनते थे। अगर वो नहीं मिला तो घर परिवार की आफत होना तय था। यह बात बिल्लू को मालूम थी कि पापा को तहमद नहीं मिला तो सारा गुस्सा बिल्लू पर ही निकलना था।
अब यह तय हुआ कि फिल्म के खत्म होते ही सबसे पहले निकल कर दौड़ लगा देनी है। ठीक वैसा ही हम लोगों ने किया। सबसे आगे बिल्लू उसके पीछे मैं और बाद में मोहल्ले के बाकी लड़के दौड़ रहे थे। इधर पापा को इतनी जल्दी नहीं थी। फिर स्टैंड से साइकिल भी निकालनी होती है। उसमें कम से कम 15 से बीस मिनट लग ही जाते है। इधर हम ऐसे दौड़ रहे थे जैसे हम सबके पीछे कोई भूत लग गया हो। सबकी सांसें फूल रही थीं। लगभग 20 मिनट तक लगातार दौड़ने से हम सबकी सांस फूल चुकी थी। हांफते हांफते हम लोग घर पहुंचे। मम्मी ने पूछा क्या बात इतना हांफ क्यों रहे हो। हम लोगों ने कुछ नहीं कहा और कपड़े बदल कर सोने का बहाना करने लगे। 10 पंद्रह मिनट बाद पापा भी घर पर पहुंच गये। मम्मी ने पूछा कि आज आप बहुत देर से घर आये। पापा ने कहा कि वो फिल्म देखने चले गये थे। उस रात पापा ने खाना भी नहीं खाया और तहमद पहन कर सोने चले गये। हम दोनों भाई चुपचाप लेटे यह सब सुन और देख रहे थे। सोच रहे थे कि अगर घर जल्दी नहीं पहुंचते तो आज जबरदस्त कुटाई होती और उन्हें बचाने वाला कोई नहीं होता।








