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बात उन दिनों की है
डाक एडिशन में हुए इस कांड ने पूरी एडिटोरियल की जान सांसत में डाल दी थी। अब तो यह तय था कि कुछ खतरनाक होने वाला है। बड़ा होने की आशंका सबके दिलो दिमाग पर गहरा रही थी। उधर जीएम साहब ने भी पैंतरे बदलने शुरू कर दिया। अचानक उनका फर्मान आया कि डाक डैस्क सस्पेंड कर दी गयी है। आठ नौ लोगों में मैं शामिल था। मैंने उनसे मिलकर यह फरियाद की सर मैं तो उन दिनों कामर्स पेज की जिम्मेदारी पर था। इस लिहाज से मेरा निलंबन तो उचित नहीं है। इस पर उन्होंने बहुत ठंडे स्वर में कहा कि जब जुर्माना लगता है तो पूरे गांव पर लगाया जाता है। मैं जानता था कि यहां सिर मारने से कोई फायदा नहीं होने वाला। अत: मैंने केबिन से निकल कर और किसी जगर प्रयास करने का मना बनाया।
कुछ दिनों के लिये अरविंद कुमार सिंह लखनऊ बतौर एडिटोरियल हेड बन कर आये थे। उनसे हम सबकी खूब बनती थी। लेकिन जीएम साहब के रवैये के चलते उन्हें भी वापस दिल्ली ब्यूरो में जाना पड़ा। वो भी पंकज वर्मा के शिकार बन गये थे। इस मामले में मैंने कुछ सलाह मांगने का मन बनाया। लेकिन मैं यह बात भी जानता था कि पंकज वर्मा जी के आगे किसी की भी नहीं चलती है। इसके बावजूद मैं फोन पर ही बात की। बात उनके हाथ से बाहर की थी। फिर भी उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा कि विनय आप लोग परेशान होने की जरूरत नहीं है। मेरे स्तर से जो मदद होगी मैं जरूर करूंगा। मामला इतना बड़ा था कि कोई भी हाथ डालने से घबरा रहा था। यह तो था कि मामले की जांच जरूर होगी। अब इस जांच में कौन कौन होगा इस बात की जानकारी नहीं थी। पर इतना तय था कि दिल्ली गाजियाबाद से जरूर कोई आयेगा।
गाजियाबाद में चेयरमैन साहब के करीबी रिश्तेदार एसके गर्ग साहब का आना तय माना जा रहा था। बाकी अन्य लोगों की कोई खास भूमिका नहीं मानी जा रही थी। गर्ग साहब गाजियाबाद के इंजीनियरिंग कालेज के सवेसर्वा थे। लेकिन समस्या ये थी कि उनसे मिलकर अपनी बात कैसे समझायी जाये। एसपी सिंह और प्रणय मोहन इस मुहिम में लगे कि जब गर्ग साहब लखनऊ आये तो उनके कमरे में मुलाकात की जाये। इंक्वायरी की डेट भी नहीं जाहिर की गयी थी। लेकिन यह बात तो थी कि एक सप्ताह के भीतर जांच होनी है।
आखिर कार वो दिन आ ही गया जिस दिन हम सभी की इंक्वायरी कमेटी के आगे पेशी होनी थी। सबसे पहले प्रणय मोहन और एसपी सिंह से सवाल जवाब हुए। करीब आधा घंटा पूछताछ की गयी। अनुराग गुप्ता, इला भटनागर, आशीष दीप और राजेंद्र मुंशी से पूछताछ की गयी। मेरे से भी पूछताछ की गयी मैं उन्हें साफ बता दिया कि इस मामले में मेरी कोई भूमिका नहीं है। जिस दिन यह हादसा या कांड हुआ उन दिनों मैं कामर्स डेस्क का काम देख रहा था। जांच अधिकारियों को यह बाद काफी अटपटी लगी कि जो व्यक्ति डाक के पन्नों में इन्वाल्व नहीं है। उसे इस केस में कैसे शामिल कर लिया गया। जांच टीम ने मेरी बात की प्रमाणिकता की जांची। उसमें मेरी बात सही साबित हुई। लेकिन यह तो तय था कि सजा तो डाक डेस्क के अन्य सदस्यों मिलनी ही थी।
जांच कंप्लीट होने के बाद जाचं टीम वापस दिल्ली लौट गयी। मेरे को यह आश्वासन दिया गया कि आपका ससपेंशन खत्म कर दिया जायेगा। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था क्यों कि पकंज वर्मा जी अपने प्लान को इतनी आसानी से फेल होता नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने एक दिन मुझ अपने केबिन में बुलाया और कहा कि किसी तरह मैंने तुम्हें मामले से बचा लिया है। तुम्हारा निलंबन खत्म कर दिया जायेगा। अब आप जा सकते है। अगले दिन मैं यह सोच कर डाक डैस्क पर काम करने लगा कि जीएम साहब का संदेशा आया कि तुरंत मिलें। मैं वहां से उठकर सीधे जीएम साहब के केबिन में गया। उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा कि आप डाक डैस्क में क्या कर रहे हैं। मैंने आपसे ज्वाइन करने को कहा क्या। मैं उन्हें सिर्फ हैरानी से ताकता रह गया। उनकी नाराजगी का कारण नहीं समझ पा रहा था। वो पांच मिनट तक बेवजह लाल पीले होते रहे और मैं चुपचाप उनकी बातों को सुनता रहा। एक कारण यह भी था कि मेरे परिवार के लिये नौकरी बहुत जरूरी थी। मैं किसी प्रकार से वर्मा जी से बिगाड़ नहीं कर सकता था। जल में रह कर मगर से बैर लेने की मेरी हिम्मत नहीीं थी।
बाकी सब को अगले आदेश तक सस्पेंड कर दिया गया। सिर्फ मेरा और अनुराग गुप्ता को बहाल किया गया। बाद में यह भी पता चला कि हम दोनों को चेयरमैन साब ने गर्ग साब की अनुशंसा पर बहाल किया। लेकिन इस घटना के बाद से ही सस्पेंड कर्मचारियों ने अन्य संस्थानों में जगह बनाने का पयास कर दिया। कुछ को जॉब मिला कुछ घर पर ही बैठ गये। प्रणम मोहन ने प्रिंट मीडिया से दूरियां बनाते हुए न्यूज चैनल में हाथ पैर मारे और उसका ईटीवी हैदराबाद में हो गया एस पी सिंह कुछ दिनों घर पर रहे और जुगाड़ लगा कर वापस वायस आफ लखनऊ में आ गये। एक बात सबको मालूम था कि कोई और अखबार उन्हें अपने यहां काम नहीं देता क्यों उन्होंने इतने दुश्मन बना लिये थे कि काम की कोई संभावना ही नहीं थी। उनकी छवि एक अराजक तत्व की बन गयी थी। ये बात और थी कि वो बहुत ही साफ दिल के थे लेकिन हर कोई उनकी बात को समझ पाने में सक्ष्म नहीं था। ठाकुर होने की वजह से वो ठेठ उसी अंदाज में सबसे बोलते थे। यह बात हर किसी को नहीं भाति थी। इसी के चलते संपादकीय में दो धड़े बन गये एक एसपी के समर्थन में तो दूसरा विरोध में लेकिन खुलकर कभी सामने नहीं आते थे।








