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जब कोई कहता है कि राहुल गांधी का दादा मुस्लिम था, तब इससे क्या पता चलता है? कोई कहता है कि फलां पार्टी मुस्लिमों की है, तब अप्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों के बारे में क्या कहा जाता है? इसी पर मैंने अपनी बात रखने की कोशिश की है.
गुजरा अप्रैल माह सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिहाज से बेहद निराशाजनक रहा। रामनवमी और हनुमान जयंती के मौके पर देश भर से सांप्रदायिक दंगों की ख़बरों ने चिंतित किया। हालांकि, देश में सांप्रदायिक दंगे कोई नई बात नहीं हैं। लेकिन, हालिया दंगों के कारणों में एक नई बात थी जो पूरी सोशल मीडिया पर छाई रही। शोभायात्रा को मस्जिदों के बगल से गुजारा गया और मस्जिदों के सामने यात्रा को रोक कर तेज आवाज में डीजे बजाया गया और नारेबाजी की गई। यह लगभग हर उस शोभायात्रा का पैटर्न था जिसमें हिंसा हुई। सोशल मीडिया पर वायरल ऐसे वीडियो को देखने के बाद एक बात जो समझ में आई, वो यह कि मस्जिदों के सामने जानबूझकर रूक कर नारेबाजी करना और डीजे म्यूजिक बजाना पूर्व सुनियोजित था। अगर अलग-अलग शहरों की शोभायात्रा का एक पैटर्न था, जो जरूर यह किसी संगठन द्वारा प्रायोजित रहा होगा। लेकिन, इन दंगों में मुस्लिमों की छवि ऐसी बनाई गई कि उन्होंने की हिंसा की शुरुआत की और इसलिए दंगे हुए। सोचने और समझने वाली बात है कि हर दंगे में गलती एक ही समुदाय की कैसे हो सकती है।
असल में, यह कोई पहला मौका नहीं है जिसमें भारतीय मुसलमानों की छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई है। यह बताने की कोशिश की गई हो कि इस्लाम सबसे बुरी कौम है। पिछले 7-8 सालों से भारत के हिंदूवादी संगठन इस काम को जोर-शोर से अंजाम दे रहे हैं। अभी हाल के दिनों को ही देख लीजिए। अजान विवाद, हलाल मीट, हिजाब एक के बाद एक ऐसे मामले उठाए जा रहे हैं जिनके केन्द्र में सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम समुदाय है। फिर चाहे, दिल्ली से लेकर उत्तराखंड तक का धर्म संसद हो, इन सभी में अगर किसी समुदाय के खिलाफ जहर उगला गया, तो वो मुस्लिम समुदाय था। इतना ही नहीं, पूरे भारत में मुस्लिम राजनीतिक रूप से हाशिये पर है। कुल 28 राज्यों में कहीं पर भी मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं है। मुस्लिमों की आबादी के अनुपात में देश में न तो सांसद हैं और न ही विधायक। लेकिन, फिर भी इस देश के हिंदुओं को मुस्लिमों से डराया जाता है जबकि यहाँ मुसलमान हिंदुओं की आबादी के पांचवें हिस्से के बराबर भी नहीं है।
भारत में एक रवायत चल पड़ी है कि अगर किसी का नाम धूमिल करना है, तो उसका नाम मुसलमान से जोड़ दो। अगर किसी राजनीतिक दल को अछूत बनाना हो, तो उस दल में मुसलमानों का वर्चस्व बता दो, भारत का हिंदू समुदाय उस दल को भूल कर भी वोट नहीं करेगा। यहाँ चुनावों में जीत का एक ही फॉर्मूला है और वह है मुसलमानों से नफरत।
असल में, भारतीय मुसलमानों को अछूत साबित करने की नापाक कोशिश चल रही है। नफरत और हिंदू-मुस्लिम के बीच शक पैदा कर हिंदुओं को यह समझाने की कोशिश चल रही है कि मुस्लिम भरोसे के काबिल नहीं होते और इसलिए उनका बहिष्कार किया जाना चाहिए। यही वजह है कि मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले गरीब सब्जी वालों, फल वालों, ठेले-खोमचे वालों का लोग बहिष्कार करने लगे हैं। मुस्लिमों को रोजमर्रा की जिंदगी से बेदखल करने की कोशिश की जा रही हैं। लव जिहाद, धर्म परिवर्तन, भूमि जिहाद, तीन तलाक, बाबरी मस्जिद फैसला आदि का इस्तेमाल कर मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक साबित करने की कोशिश हो रही है। इतना ही नहीं, फिल्मों के जरिये भी मुस्लिमों पर निशाना साधा जा रहा है। कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों के जरिये मुसलमानों को बेदखल करने की कोशिश की जा रही है। मुसलमानों को अभी छोटे-छोटे, लेकिन गहरे जख्म दिये जा रहे हैं ताकि भविष्य में यही सामान्य बन जाए और इनमें कुछ भी नया महसूस न हो।
दरअसल, मुस्लिमों को हाशिये पर लाने की कोशिश है ताकि उनकी विरासत और योगदानों का नामो-निशान मिटा दिया जाए। देश की रक्षा में मोहम्मद उस्मान, अब्दुल हमीद, अब्दुल कलाम जैसे मुस्लिमों के योगदानों पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। मुस्लिमों को इतना बदनाम कर देने की कोशिश की जा रही है कि देश निर्माण में अपने योगदानों को लेकर वो सवाल ही न कर सके। देश की आजादी में, इसे सजाने सँवारने में वो बराबर का हकदार होने के बावजूद, आज नौबत यह आ गई है कि मुस्लिमों को देश के नागरिक होने का दावा करना पड़ रहा है। इसके उलट बहुसंख्यक समुदाय को कभी किसी बात के लिए न तो सफाई देनी पड़ती है और न ही कोई सबूत पेश करना पड़ता है।
रूस के सामाजिक कार्यकर्ता गैरी कोस्पारोव ने कहा था- ‘अगर आप बहुसख्यकों को यकीन दिला सकें कि वे अल्पसंख्यकों के पीड़ित हैं और आप उनकी रक्षा कर सकते हैं, तो आप लोकतंत्र में सफल हो सकते हैं’। लेकिन, भारत के मुस्लिम अलपसंख्यक सबसे बड़े गुनहगार के तौर पर पेश किया जा रहे हैं। राजनीतिक, संस्थागत, आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार के जरिये हिंदू-मुस्लिम के बीच मोटी लकीर खींचने की कोशिश हो रही है। डर इस बात की है कि कहीं बहिष्कार की यह परिपाटी आने वाले वर्षों में भारत को अस्थिर न कर दे।
मौजूदा वक्त में भारत के लगभग 50 फीसद मुस्लिम 19 साल से कम उम्र के हैं। ये नौजवान हैं जो नफरत और असहिष्णुता के माहौल में बड़े हो रहे हैं। यह एक ऐसी पीढ़ी है जो बहिष्कार और अलगाव महसूस कर रही है। हिंदू समाज में ऐसे युवाओं की तादाद करीब पांच गुनी है। वे भी इसी माहौल में बड़े हो रहे हैं। ऐसे में भविष्य की चिंता लाजिमी है। भविष्य का हमारा भारत कैसा होगा, उसकी तस्वीर धुंधली जरूर है, लेकिन हम इतने भी भोले नहीं हैं कि उसका अंदाजा न लगा सकें। सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि हिंदू समुदाय भी डर के माहौल में गुजर-बसर कर रहा है और कोई भी सामान्य व्यक्ति ऐसा नहीं चाहता। ऐसा नहीं है कि इसमें नुकसान सिर्फ मुस्लिमों का है, हिंदू भी इसमें पिस रहे हैं। लेकिन, हम सभी को ठंडे दिमाग से यही सोचना है कि ऐसे डर भरे माहौल को जीवित रखने से आखिर लाभ किसे मिल रहा है। जिस दिन इसका जवाब हमें मिल जाएगा, देश से नफरत का नामो-निशान मिट जाएगा।
रिज़वान अंसारी
यह लेख स्वतंत्र पत्रकार का है ये उनके अपने विचार हैं इससे वेबसाइट का सहमत व जिम्मेदार होना जरूरी नहीं है।

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