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उन दिनों जब हम हाई स्कूल इंटर की पढ़ाई कर रहे थे होली दीपावली और दशहरे का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते थै। हो भी क्यों इन दिनो घर से घूमने की पूरी आजादी रहती थी। उन घरों में भी जाने का मौका मिलता जहां सामान्य तौर पर जा नहीं पाते थे। अब खुलकर बता देता हूं उन घरों में जहां सुंदर सुंदर कन्याएं रहती थीं। होली के बहाने ही सही उनको करीब से देखने का मौका मिल जाता था। हमारे दोस्तों में रजत श्रीवास्तव, तारिक अख्तर, रिजवान, काशीनाथ, अली, देवेंद्र गुप्ता, रवींद्र मोहन आदि हुआ करते थे। अब सिर्फ रजत और देवेंद्र से ही संपर्क रह गया है। बाकी सब लोग काम धंधे की वजह से कानपुर छोड़ कर दूसरी जगह चले गये और आज अपनी अपनी पारिवारिक समस्याओं में उलझ कर रह गये हैं। मैं खुद 1988 से कानपुर छोड़ अलग अलग शहर में अपने परिवार के साथ डोरी डंडा उठाये घूम रहा हूं।
हमारे घर में उन दिनो होलिका दहन वाली रात में मम्मी गुझिया बनाती थीं। उनके हाथ की बनी गुझियों का स्वाद आज भी मुझे याद आता है। छोटी छोटी मोमन की बनी खोय की गुझिया का स्वाद ही अनोखा होता था। उन मम्मी और जीजी मिलकर गुझिया बनाया करती थीं। हम लोग इधर उधर से आते और हाथों में गरम गरम गुझिया भर कर फिर मस्ती करने निकल जाते। मम्मी बाजार से खोया नहीं मंगाती बल्कि दूध औटा कर खोया बनाती थी। उन दिनों मुझे भी गुझिया तलने का भी बहुत शौक था। आज भी मैं अपने घर में तलने का काम मेरे ही जिम्मे होता है। लेकिन गुझिया गोठने और भरने को कहा जाता था जो मुझसे होता नहीं था। कभी मावा अधिक होता तो कभी कम। इससे गुझिया तलते समय फूट जाती और घी में मावा चला जाता ये मम्मी को अच्छा नहीं लगता। ऐसे में मुझे सिर्फ तलने का काम ही दिया जाता था।
उन दिनों होली दहन की रात हम सब दोस्त ग्रुप बना कर पूरे मोहल्ले में घूमना शुरू कर देते थे। हम सब लोग पुराने कपड़े पहनते ताकि रोज पहनने वाले कपड़े खराब न हो जायें, साथ ही चेहरे पे नारियल का तेल चुपड़ लेते ताकि सफेदा और आयल पेंट आसानी से छूट जाये। उन दिनों होलिका दहन चार पांच बजे होता था। वहां मौजूद लोग फाग और गालियां भी गाते थे। वहीं से होली की शुरुआत हो जाती थी। सारी रात जाग कर घूमते थे। यह जानते हुए कि अगले दिन भी हमें जगना है मस्ती करनी है और बीस पच्चीस घरों में जाकर आलू और साबूदाने के पापड़, गुझिया और चिप्स खाने होते हैं। कानपुर में जबरदस्त हुडदंगी होली होती थी। यह भी देखा जाता कि ज्यादातर शराबी हुड़दंगियों के कपड़े फाड़ दिये जाते थे। कानपुर में रंग कम कीचड़ और गोबर की होली खेली जाती है। औरतें भी बढ़ चढ़ कर होली में रंग खेलती थी। औरतें सुबह से निकलते तो शाम चार बजे ही वापस घर की देहरी पर पहुंचते। तब जाकर घर में नहाने की व्यवस्था देखते। पूरे एक घंटे तक रगड़ रगड़ कर नहाने के बाद लड़भी रंग पूरी तरह से नहीं निकलता। दोन तीन दिन तक रंगे हुए चेहरे के साथ रहना पड़ता था। शाम को फिर से नये कपड़े पहन कर राजा बाबू की तरह मोहल्ले में टहलने निकल पड़ते थे। वैसे भी कानपुर में होली का खुमार एक सप्ताह तक चढ़ा रहता था। गंगा मेले तक लोग होली मनाते हैं। पहले तो जिस घर के आगे ढोल ताशे वाले बजाते उस घर के आगे ही लोग मस्ती में तेज म्यूजिक पे नाचने लगते। वहीं आस पास के घरों से होली क पकवान पापड़, चिप्स, दालमोठ और गुझिया आती और सब हुलियारे उनका मजा लेते। इन जगहों पर मैं अपने दोस्तों के साथ खूब जमकर मस्ती करते। आज भी उन दिनों की याद आती है तो चेहरे पर बेसाख्ता मुसकराहट आ जाती है।
आज वो यादेें ताजा हो गयी हैं। सभी को होली की रंगों भरी शुभकामनाएं। बुरा न मानो होली है।








