देश की अर्थव्यवस्था में चालू वित्त वर्ष की जुलाई-सितंबर तिमाही में 7.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। लॉकडाउन के कारण देश की पहली तिमाही में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 23.9 फीसद गिरावट दर्ज होने के अब दूसरी तिमाही में गिरावट हुई है। तकनीकी तौर पर देश आर्थिक मंदी में फंस चुका है, क्योंकि सितंबर तिमाही में लगातार दूसरी बार जीडीपी में गिरावट आई है।
GDP at constant (2011-12) prices in Q2 of 2020-21 is estimated at Rs 33.14 lakh crores, as against Rs 35.84 lakh crores in Q2 of 2019-20, showing a contraction of 7.5% as compared to 4.4% growth in Q2 of 2019-20: Ministry of Statistics & Programme Implementation
— ANI (@ANI) November 27, 2020
तात्कालिक पूर्वानुमान विधि का प्रयोग करते हुए केंद्रीय बैंक के शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि जुलाई-सितंबर तिमाही में जीडीपी का आकार 8.6 फीसद तक घट जाएगा। इससे पहले आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष में जीडीपी में 9.5 फीसद की गिरावट का अनुमान लगाया था। आरबीआई के शोधकर्ता एवं मौद्रिक नीति विभाग के पंकज कुमार की ओर से तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत तकनीक रूप से 2020-21 की पहली छमाही में अपने इतिहास में पहली बार आर्थिक मंदी में फंस गया है।
किसने कितना लगाया था अनुमान
- भारतीय रिजर्व बैंक को जीडीपी में 8.6 फीसद की गिरावट का अनुमान था
- इंडिया रेटिंग्स ने 11.9 फीसद की गिरावट का अनुमान लगया था।
- स्टेट बैंक ने 10.7 तो बैंक ऑफ बड़ौदा ने 8 फीसद की गिरावट का अनुमान लगाया था।
- दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी में नोमुरा ने 10.4 तो बार्कलेज 8.5 फीसद की गिरावट की आशंका जाहिर की थी
- बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की रिपोर्ट में GDP के 7.8 फीसद गिरने का अनुमान लगाया गया था
- मॉर्गन स्टेनली को जीडीपी ग्रोथ में 6 फीसद की गिरावट का अनुमान था।
- ICRA ने जुलाई-सितंबर तिमाही में भारत की आर्थिक ग्रोथ के 9.5 फीसद गिरने का अनुमान लगाया था।
- CARE रेटिंग ने GDP ग्रोथ में 9.9 फीसद की गिरावट का अनुमान लगाया था।
अर्थव्यवस्था में मंदी को सबसे सरल शब्दों में कहा जाए तो किसी भी अर्थव्यवस्था में मंदी का एक चरण एक विस्तारवादी चरण के बराबर है। दूसरे शब्दों में, जब वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, जिसे आम तौर पर जीडीपी द्वारा मापा जाता है, एक तिमाही (या महीने) से दूसरे में चली जाती है, तो इसे अर्थव्यवस्था का एक विस्तारवादी चरण कहा जाता है। जब जीडीपी एक तिमाही से दूसरी तिमाही में कम हो जाती है, तो अर्थव्यवस्था को मंदी के दौर में कहा जाता है।
कब कही जाती है मंदी
वहीं जब अर्थव्यवस्था की गति लंबे दौर के लिए धीमी होती है तो इसे मंदी कहा जाता है। यानी, जब जीडीपी एक लंबी और पर्याप्त अवधि के लिए कम होती है तो मंदी कहलाती है। वैसे मंदी की कोई स्वीकार्य परिभाषा नहीं है, लेकिन ज्यादातर अर्थशास्त्री इसी परिभाषा से सहमत हैं, जिसे अमेरिका में नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च भी उपयोग करता है।
नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के अनुसार, एक मंदी के दौरान आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण गिरावट आती है। यह कुछ महीनों से एक साल से अधिक वक्त तक जारी रह सकती है। आर्थिक गतिविधियों में गिरावट की “गहराई, प्रसार, और अवधि” को देखने के लिए यह भी निर्धारित किया जाता है कि कोई अर्थव्यवस्था एक मंदी में है भी या नहीं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में आर्थिक गतिविधियों में हाल में सबसे ज्यादा गिरावट आई, जिसके पीछे कोरोना महामारी है। वहां की आर्थिक गतिविधियों में गिरावट इतनी ज्यादा हुई है कि इसे एक मंदी के तौर पर माना गया है।







