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क्या भाजपा के बुरे दिन आ रहे हैं!
जहां देखो वहां भाजपा की दुर्गति हो रही है वो राजस्थान हो कर्नाटक हो या मध्यप्रदेश। या फिर छत्तीस गढ़। इसके अलावा महाराष्ट्र जहां उनकी सरकार चल रही है वहां भी हालात दिन ब दिन बिगड़ते जा रहे हैं। वहां सीएम तो शिवसेना शिंदे गुट के नेता एकनाथ शिंदे हैं। लेकिन दो उपमुख्यमंत्री हैं। जिनमे एक पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं और दूसरे एनसीपी से टूट कर आये अजित पवार हैं। ये भी सीएम बनने का ख्वाब लेकर सरकार में शामिल हुए हैं। लेकिन इनके साथ बीजेपी ने यह शर्त रखी है कि अगर वो शरद पवार को एनडीए में वापस ले आये तभी अजित पवार सीएम बन पायेंगे। लेकिन शरद पवार ने अजित पवार के सपने पर पानी फेर दिया है। अब महाराष्ट्र में सीएम पद के लिये घमासान मचा हुआ है। आम चुनाव में अभी तक पीएम मोदी और शाह को विश्वास था कि अगली बार आम चुनाव में वो आसानी से जीत हासिल कर सकते हैं। लेकिन हिमाचल, कर्नाटक और दिल्ली एमसीडी की लगातार तीन हारों में उनका मनोबल भी हिल गया है। यही वजह है कि वो वन नेशन वन इलैक्शन का राग अलापने लगे हैं। दूसरी ओर इंडिया गठबंधन की मजबूती से भी मोदी और शाह घबरा गये हैं। उनके भाषणों में सिर्फ इंडिया का खौफ दिखने लगा है। पीएम मोदी शाह से लेकर पूरी पार्टी और सरकार गठबंधन से जुड़े नेताओं को कोसते नजर आ रहे हैं।
CM Post एक अनार अनेक बीमार
सबसे दिलचस्प बात यह है कि महाराष्ट्र में सीएम पद तो एक हैं लेकिन सीएम पद के दावेदार तीन हैं। एकनाथ शिंदे तो सीएम हैं ही लेकिन इनके अलावा दो और भी लोग हैं जो सीएम बनना चाहते हैं। एक तो पूर्व सीएम रह चुके देवेंद्र फडणवीस हैं तो दूसरे अजित पवार हैं जिन्हें शामिल होने से पहले सीएम बनाने का वादा किया था। उनके साथ पार्टी के दिग्गज नेता छगन भुजबल, मुशरिम हसन प्रफुल्ल पटेल समेत लगभग 32 विधायकों ने एनसीपी से बगावत कर सरकार में आ गये है। साथ में आये सभी विधायकों को सरकार में मलाइदार पद चाहिये। सबको मंत्री बनना है। लेकिन सरकार में भी को मंत्री तो नहीं बनाया जा सकता है। इससे सरकार में शामिल होने आये नेता और विधायक ज्यादा दिनों तक शांत नहीं बैठ सकते हैं। वो भी बस मौके की तलाश में रहते हैं। ऐसा ही कुछ एनसीपी से आये विधायक बेचैन हैं कि कब मौका मिले वो पल्टी मार जायें। एक बात तो यह तय है कि चुनाव आते आते महाराष्ट्र सरकार गिर सकती है या खुद गिरवायी जा सकती है। या तो भाजपा अपने दोनों सहयोगी दलों शिवसेना शिंदे गुट और एनसीपी अजित पवार को चलता कर देगी। क्यों कि जब से प्रदेश में उद्धव ठाकरे सरकार का पतन हुआ है तभी से जनता में भाजपा की छवि तोड़ फोड़ करने वाली पार्टी की बनती जा रही है। पहले शिवसेना फिर साल भीतर एनसीपी को भी तोड़ दिया। यह बात अब जनता को समझ में आ गयी है कि भाजपा सत्ता पाने को किसी भी स्तर पर जा सकती है।

इसी तर्ज पर शिवसेना को भी तोड़ा था बीजेपी
एक सवा साल पहले प्रदेश में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की महा विकास अघाड़ी की सरकार चल रही थी। अचानक एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायकों ने सरकार के खिलाफ मुहिम चलाते हुए सरकार को गिरवा दिया। इसके साथ बीजेपी के साथ मिलकर प्रदेश में सरकार भी बना ली। बीजेपी ने मोंके की नजाकत देखते हुए एकनाथ शिंदे को चीफ मिनिस्टर बना दिया और पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस को डिप्टी सीएम बनाया। वैसे केन्द्रीय नेतृत्व के इस फरमान से फडणवीस खुश नहीं थे। लेकिन कोई और विकल्प भी नहीं था। मन मसोस कर सरकार में शामिल हो गये। लेकिन सीएम शिंदे और उनके बीच हमेशा किसी न किसी बात को लेकर खटकती रहती है। शिंदे भी सीएम के रूप में पूरी तरह से सरकार पर हावी रहते जिससे फडणवीस के अहम् को चोट लगती।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की दुर्गर्ति
मध्यप्रदेश में हालत यह है कि शिवराज सिंह सत्ता बचाये रखने को रोज रेवडियां बांट रहे हैं। दिल्ली सरकार की सुविधाओं को भाजपा रेवड़ियां बताती नहीं थक रही है वहीं मध्यप्रदेश में मामा रोज रेवड़ियां बांट रहे हैं। स्कूटी, रसोई गैस सिलिंडर और महिलाओं को भत्ता बांटने का ऐलान कर रहे है। लेकिन सर्वे बता रहे हैं कि बीस साल से मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह राज कर रहे है। लोगों में भारी असंतोष है। हिन्दूवदी संगठन अल्पसंख्यकों और आदिवासियों पर जुल्म ढा रहे हैं। लेकिन सरकार और पुलिस एक तरफा कार्रवाई करती है। पुलिस पर सांप्रदायिक होने का आरोप भी लग रहा है।

ऐसा ही कुछ हाल राजस्थान का है जहां केन्द्रीय नेतृत्व पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को नजर अंदाज कर उनकी तौहीन कर रहा है वहीं वसुंधरा विरोधी नेताओं को राज्स्थान में बढ़ावा दे रहा है। वहां भी पार्टी नेताओं में जबरदस्त कलह देखी जा रही है। अगर केन्द्र ने वसुंधरा के प्रति रवैया नहीं बदला तो राजस्थान में सरकार बनाने का ख्वाब देखना भाजपा बंद कर दे। छत्तीसगढ़ में सीएम भूपेश बघेल का मुकाला करने के लिये कोई मजबूत नेता नहीं है। डा. रमन सिंह ने 2003 से 2018 तक छत्तीसगढ़ में सीएम पद संभाला था। लेकिन केन्द्र ने उन्हें भी तेल कर दिया है तो वहां भी भाजपा की दाल गलते नहीं दिख रही है। वहां भाजपा ईडी सीबीआई और दनकम टैक्स के सहारे ही चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है।







