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पिछले आठ दस माह से लोगों में यह चर्चा है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की रक्षा करने में अहम् भूमिका निभा रहा है। सीजेआई बहुत ईमानदारी से निष्पक्षता से बिनाा किसी राजनीतिक दबाव के फैसले ले रहे हैं। कुछ मामलों में सुप्रीमकोर्ट ऐसे ले लेकर जनता में यह उम्मीद जतायाी कि देश में संविधान नाम की चीज है जिस पर आम आदमी का विश्वास कायम बना रहे हैं। लेकिन अन्य बड़े मामलां सुप्रीम केार्ट न केवल चुप रहा बल्कि उसके फैसलों पर सवाल उठ रहे है। लोगों को सीजेआई डीवाई चंद्रचूड से काफी उम्मीदें जगी थी। लेकिन धीरे धीरे जनता को एहसास हो रहा है कि हाथी के खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज भी इंसान ही होते हैं उनके भी परिवार होते है। उन्हें भी राज्यपाल या सांसद बनना होता है। धीरे धीरे लोगों के मन में सुप्रीम कोर्ट के प्रति वही पुरानी छवि दिखने लगी है। लगता है जिस तरह भाजपा और कांग्रेस के साथ सुप्रीम कोर्ट को 3 दिसंबर का इंतजार है

मणिपुर यौन उत्पीड़न का मामला
जुलाई में जब मणिपुर यौन उत्ीड़न और आगजनी का मामला सामने आया तो सीजेआई ने स्वतःसंज्ञान लेते हुए मोदी सरकार मणिपुर सरकार को नोटिस देते हुए कहा कि दो सप्ताह के भीतर अगर सरकार कोई ऐक्शन नहीं लेती है तो सुप्रीमकोर्ट कड़ा कदम उठायेगी। सिवाय एक जांच कमेटी बनाने के कोई कद नहीं उठाया गया है। उस कमेटी की जांच में क्या निकल कर आया यह भी सार्वजनिक नहीं हुआ है। सुप्रीम केार्ट के रवैये से लग रहा था कि वो मोदी सरकार और मणिपुर सरकार की लापरवाही के खिलाफ कोई न कोई ऐक्शन लेगा लेकिन चार माह बाद भी न तो मोदी सरकार ने वहां के सीएम एन बीरेंद्र सिंह को हटाया और न ही वहां की ंिहसा और उत्पीड़न पर ही नियंत्रण लग पाया है। इस मामले में मणिपुर वासियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी उसके आगे कुछ करता नहीं दिख रहा है।
बिल्कीस बानों गैंग रेप और मर्डर केस भी ठंडे बस्ते में
2002 में गंुजरात दंगों के दौरान मुस्लिम महिला बिल्कीस बानों के साथ 11 लोगों ने सामूहिक बलात्कार औरं परिवार के उसके 7 लोगो की हत्या के दोषियों को 15 अगस्त 2023 में गुजरात की बीजेपी सरकार सभी दोषियों को जेल से रिहा कर दिया। सरकार का कहना था कि उन लोगों किये हुए अपराध की 10 साल से अधिक सजा काट ली है इसलिये सरकार ने उनकी सजा मुक्त कर रिहाई की पैरवी की है। वास्तविकता तो यह है कि सभी आरोपी लगभग पांच साल से अधिक परोल पर जेल से बाहर रहे। इस बात को लेकर पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी अर्जी लगाते हुए उनकी जेल से रिहाई पर सवालिया निशाने उठाये हैं। उसका कहना है कि जब जब वेा लोग आजाद घूमते दिख्ते हैं तो उसे लगता है वो अपराधी उसकी जिंदगी पर मजाक उड़ाते दिखते है। वहां भी सुप्रीम कोर्ट सिर्फ गुजरात सरकार और केन्द्रीय गृहमंत्रालय को नोटिस थमा कर शातं बैठ गया है।
ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ियों को राहत नहीं
पिछले साल के अंत में ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ियों ने यौन शोषण के खिलाफ दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन किया था। तब खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने खिलाड़ियों को विश्वास दिलाया था कि उनके साथ न्याय होगा। लेकिन मंत्री के दावे और वादे दोनों ही झूठे निकले। ऐसे में खिलाड़ियों एक बार फिर जंतर मंतर का रुख करते हुए भारतीय कुश्ती फेडरेशन अध्यक्ष और सांसद ब्रजभूषण शरण के खिलाफ धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। बीजेपी एमपी के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रयास किया तो दिल्ली पुलिस ने मामला दर्ज करने से मना कर दिया। इसका प्रमुख कारण यह था कि मामला बीजेपी एमपी ब्रज भूषण शरण के खिलाफ था। केन्द्र सरकार की ओर से भी खिलाड़ियों को राहत नहीं दी गयी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया लेकिन महिला खिलाड़ियों के साथ दिल्ली पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज किया। इतना ही नहीं महिला खिलाड़ियों को न केवल दिल्ली की सड़को पर बालों से पकड़ कर घसीटा गया बल्कि उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मामले भी दर्ज किये। ये सब कुछ मोदी सरकार के इशारे पर सांसद को बचाने के लिये किया गया। यहां भी सुप्रीम कोर्ट ने सब कुछ देखने सुनने के बाद कुछ भी नहीं किया है। जबकि ब्रज भूषण शरण को जमानत मिल जाती है। इंतने गंभीर आरोप में वांछित सांसद को बेल मिल जाती है। लेकिन विपक्ष के नेताओं को जमानत अदालते नहीं दे रही है।

मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और उमर खालिद को जमानत नहीं
यह सोचने का विषय हैै देश में गंभीर आरोपों में वांछित अपराधियों को अदालतें बेल देने में देर नहीं करती हैं वहीं देश के विपक्षी राजनेताओं को जमानतें देने में कोर्ट आनाकानी कर रही हैं। मामला चाहे वो सतेंद्र जैन का हो या उपमुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया का चाहे फिर आप सांसद संजय सिंह का। बिना किसी सुबूत के ईडी ने हिरासत में लेकर जेल भेज दिया। लेकिन कोर्ट इस मामले में चुप हो कर जांच एजेंसियों की बात को मानकर जमानत याचिका खारिज कर देती हैं। ऐसा ही कुछ जेएनयू पूर्व छात्रनेता को पिछलेे तीन साल से जेल में है उन पर दिल्ली दंगे में भड़काने का आरोप दिल्ली पुलिस ने लगा रखा है। आज तक ट्रायल तक नहीं शुरू किया गया है। जमानत याचिका हर बार कोई न कोई कारण बता कर खारिज कर दी जाती है।








