देश में छोटे और मझोले उद्योगों एमएसएमई के लिए इक्विटी सपोर्ट के रूप में 20000 करोड़ का ऐलान वित्त मंत्री ने राहत पैकेज के रूप में किया था। इस बात को 1 महीना बीत चुका, बैंक अभी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। एमएसएमई को 75 लाख तक का लोन मिलना है।
लेकिन बैंकों को आरबीआई की कोई गाइड लाइन नहीं आई है कि पैसे को कैसे खर्च किया जाएगा। एमएसएमई को वक़्त 31 दिसंबर तक का है, जो हाथ से फिसलता जा रहा है। इस बीच नागरिक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से वो 5 लाख करोड़ मांग रहे हैं, जो उन्होंने एमएसएमई के दबा रखे हैं। राज्यों की माली हालत ठीक नहीं है। एमपी सरकार आज से खुद दारू बेचेगी। लोग एमपी के लिए पियेंगे।सार्वजनिक उपक्रमों की माली हालत भी खराब है। ज़ाहिर है, मोदी सरकार सिर्फ दिखाना चाहती है कि काम हो रहा है। असल में मोदी सरकार का पूरा तंत्र लॉक डाउन से पहले ही लकवाग्रस्त हो चुका है। हालात यूपीए 2 से भी बुरे हैं।








