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धीरू भाई अम्बानी एक पेट्रोल पम्प पर नौकरी करते थे, लेकिन उनका दिमाग बेहद ही तेज था. तभी उनको सरकार की मिलीभगत से पैसा कमाने का राज पता चला। किसी तरह उन्होंने एक छोटी सी फैक्टरी खोलने में सफलता पाई. लेकिन उनके पास पूंजी नहीं के बराबर थी।
इसलिए उन्होंने बैंकों से साठगांठ की और बैंक तथा कैपिटल मार्केट, सिक्युरिटी बाजार की तमाम खामियों का लाभ उठाते हुए खूब भुनाया और तात्कालीन कांग्रेस सरकार को भी कमीसन देकर आर्थिक नीतियों, पालिसी को अपने हक़ में बनवाकर खूब धन कमाया।
अब आगे हुआ यूं, कि अम्बानी नें सोचा कि कांग्रेस को कमीसन तो देते हैं। लेकिन फिर भी कांग्रेस उन्हें उनके मन मफिक ज्यादा लूटने नहीं देती, तरह-तरह के अड़ंगे डाल देती है। इसी बीच कांग्रेस नें कई सारे आर्थिक सुधार किये, आदित्य-बिरला की अध्यक्षता में बनाए कमीसन के सुझाओं को लागू करके आर्थिक लूपहोल को बंद करना और आर्थिक सुधार करना शुरू किया।
इसीलिये अम्बानी को कांग्रेस से इतर एक ऐसे राजनीतिक पार्टी की तलाश थी, जो भले ही ज्यादा कमीसन ले, लेकिन ओनों हाथों से सरकारी लूट के सारे दरवाजे खोल दे। इसी समय हिंदुत्व के ठेकेदारों के सहयोग से गुजरात राज्य में आई मोदी सरकार। और अम्बानी नें उसे साध लिया. ना सिर्फ साधा, बल्कि कांग्रेस से ज्यादा कमीसन देकर राज्य की प्रोपर्टी को कई गुना लूटने लगा।
इसी बीच अडाणी जाति के एक दलाल ने भी अम्बानी का साथ दिया और इन दोनों जनों नें मिलकर गुजरात सरकार के साथ मिलीभगत कर खूब खूब धन कमाया।
अम्बानी के पास तो फिर भी उद्योग थे और वे बिजनेसमैन थे, लेकिन अडाणी तो सिर्फ दलाल था। लेकिन षडयंत्र करना और साठगांठ द्वारा सरकारी ठेके हथियाने में अति माहिर था।
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अब कहानी का असली ट्विस्ट बताता हूँ.
आगे हुआ यूं, कि अम्बानी-अडाणी नें सोचा कि कांग्रेस को 2-5% कमीसन देते हैं, लेकिन फिर भी कांग्रेस उन्हें बहुत ज्यादा लूटने नहीं देती। और वैसे भी सरकारी लूट तो सिर्फ मोदी के राज्य गुजरात में ही संभव थी, और वे तो पूरे देश के आर्थिक संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा हथियाना चाहते थे।
तब मोदी नें अम्बानी-अडाणी को समझाया कि यदि वे एक बार पूरे देश की सत्ता पर काबिज हो पाए, तो फिर उन्हें पूरे देश के आर्थिक संसाधन लूटने का खुल्लमखुल्ला मौका मिल जाएगा। बशर्ते वे दोनों मोदी की सरकार के साथ पार्टनरशिप कर के मोदी पर धन इन्वेस्ट करें।
ये बात अम्बानी-अडाणी को बहुत ही पसंद आई, और उन्होंने मोदी पर पैसे इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया। आर्थिक षडयंत्र करना तो उन को आता ही था। साठगांठ द्वारा सरकारी ठेके हथियाने में माहिर थे ही।
उन्होंने मोदी को हर तरह की आर्थिक सुविधाएं दी, अपने निजी हेलिकॉप्टर दिए, रैली करने के लिए तमाम धन दिया, यहाँ तक कि उन्होंने कई मीडिया, टी वी चैनल भी खरीद लिए और साथ ही मोदी का गुणगान करने और कांग्रेस को नीचा दिखाने लगे।
दूसरी तरफ रामदेव नाम नें भी आग में घी का काम किया. उन सभी लोगों नें मिलकर (आरएसएस द्वारा भीड़ इकट्ठी कर) मूर्ख अन्ना को भी कांग्रेस सरकार के विरुद्ध भड़का कर माहौल बनाया और इसमें वे बेहद ही सफल रहे।
इस तरह आरएसएस-बनिए और राजनेताओं की तिकड़ी नें २०१४ में एक बहुत बड़ा उलटफेर किया और सत्ता पर काबिज हो गए। और मोदी नें भी अपना वादा निभाया और आज देखते ही देखते अम्बानी-अडाणी-रामदेव कहाँ से कहाँ पहुँच गए, ये आप जानते ही हैं।
कमल झँवर
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