1987 में हुकूमत नाम की एक फिल्म रिलीज हुई थी। इस फिल्म में ही मैन धर्मेंद्र के आलावा खलनायक के रूप में सदाशिव राव अमरापुरकर ने कमाल का रोल निभाया था। आज अचानक मुझे उस किरदार डीबीडीएन की याद आ गयी। हुकूमत में डीबीडीएन उर्फ दीन दयाल दीना नाथ के जुल्मों से पूरा इलाका कराहता दिखाया गया था। उस वक्त इस फिल्म ने जबरदस्त धूम मचाई थी। काफी समय तक लोगों ने दीन दयाल दीना नाथ के किरदार को याद रखा था। उसका एक डायलॉग जिसमे वो यह कहता है कि दौलत के लिये तो वो देश क्या अपनी मां को भी बेच दे। इतना क्रूरतम और वहशी किरदार दिखाया गया था।
ठीक वैसा ही माहौल देश में बनता जा रहा है। जिस तरह से डीबीडीएन का कहर देशवासियों पर ढाया जाता था। ठीक उसी तरह का आज अत्याचार और भ्रष्टाचार देखा जा रहा है। जैसा कि हुकूमत में दिखाया गाया था कि किस कदर सरकारी अमले पर डीबीडीएन का खौफ था। लोग उसके खिलाफ आवाज उठाने से कांपता था। लोगों पर राज करने के लिये उसने अपनी अलग सत्ता बना रखी थी। पुलिस और प्रशासन उसके इशारों पर काम करता था। लगता है कि भारत में एक बार फिर से डीबीडीएन का शासन आ गया है।
ठीक वैसा ही माहौल भारत में भी बन गया है। सरकार आम जनता पर जुल्म ढा रही है। स्वायत्त संस्थाओं पर सरकार का कब्जा हो गया है। न्याय पालिका भी अपने कर्तव्यों को निभाने से किनारा करती नजर आ रही है। सरकार के इशारों पर उच्चतम न्यायालय अपने फैसले कर रहा है। इसके पीछे या तो स्वार्थ् है या सत्ताधारी दल का भय। पिछले छह सालों में यह देखा जा रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों में सत्ता का सुख भोगने की लालसा जाग गयी है। अधिकारी वर्ग नौकरियों से इस्तीफा दे कर राजनीति में तेजी से आ रहे हैं। सत्ताधारी दल उपने स्वार्थ के लिये सभी नियम कायदों की धज्जियां उड़ा रहा है। वहीं विपक्ष और आम जनता पर जुल्म ढा रहा है। मन माने ढंग से देश में नित नये कानून बनाये जा रहे हैं जिससे आम लोगों की जिंदगी तबाह हो रही है। सरकार और देश के कर्ता धर्ता जनता की परेशानी को सुनने के बजाय मनमानी करने पर उतारू हैं। यह देखा जा रहा है कि सरकार यह चाहते है कि जो उन्होंने तय कर दिया वहीं सबको पालन करना है। सीएए और एनआरसी जैसे कानून बना कर सरकार ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वो देश की सदियों पुरानी संस्कृति को समाप्त करना चाहती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि विपक्ष में एकता की कमी और सत्ता दल का सशक्त होना है। आम जनता में विघटन कारी गतिविधियां फैला कर समाज में नफरत की दीवार खड़ी कर दी गयी है। सत्ता बरकरार रखने के लिये युवा को धर्म और अराजकता की भंवरजाल में उलझा दिया गया है।

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