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राज ठाकरे ने कहा है कि मस्जिदों की पांच वक्त की अजान के जवाब में मस्जिद के सामने जाकर हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए। यह “विरोधी भक्ति” का एक उम्दा उदाहरण है। विरोधी भक्ति के स्तर होते हैं.राज ठाकरे का बयान विरोधी भक्ति के सबसे उत्कृष्ट स्तर से बस थोड़ा ही नीचे है. यह स्तर थोड़ा सा और आगे बढ़ा कि उन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया समझो।
कैसे? समझाता हूँ।
पहले स्तर में होता यह है कि जब आप किसी को अपना दुश्मन मान लेते हैं तो आप उसकी एक एक चीज़ बारीकी से फॉलो करते हैं। वह क्या खाता है, क्या पीता है, कितने बजे सोकर उठता है, कितनी स्त्रियों से सम्बन्ध रखता है, कौन सी शराब पीता है, कहाँ छुट्टी बिताता है, खाना खुद बनाता है या पत्नी बनाती है, उसके कितने बच्चे हैं, अधिक बच्चे हैं तो क्यों हैं, बच्चे नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं आदि…. यह सब जानकारी जरूरी है जिससे इस जानकारी के आधार पर वह उसकी घर, पड़ोस, रिश्तेदारी, सोशल मीडिया आदि पर आलोचना कर सके। वह बात आलोचना योग्य है या नहीं, इससे मतलब नहीं है.बस यह बात उस व्यक्ति से जुड़ी है इसलिए आलोचना योग्य हो जाती है. इस पवित्र आलोचना के कुछ उदाहरण देखिए –
* वह कितना बड़ा लिबरल की पूंछ बना फिरता है, औरतों को ‘खुली छूट देने’ की बात करता है.
* अमुक कितना दुष्ट है, बालों में तेल की जगह मोम लगाता है.
* अरे फलाना तो शराब पीता है. छी छी ! कितना बड़ा ऐब है. हम तो बस छोटे मोटे ऐब रखते हैं जैसे रिश्वत लेना, झूठे मुकदमे बनाना, जालसाजी करना बस. पर वह तो बहुत बड़ा ऐबी निकला. शराब पीता है. बताइए!
* अरे सुना वह मांस खा लेता है. शिव, शिव! प्राणी मात्र के लिए जरा दया नहीं. पापी है। हमको देखो जानवरों पर कितनी दया करते हैं हम. अरे बेरहमी दिखानी है तो इंसानों के प्रति दिखा लेते हैं न.
* अरे वह कितना दुराचारी है. सुना है हर तीसरे दिन उड़द की दाल खाता है. घृणित है.
* अरे वह दुष्ट व्यक्ति बिना तसमों के जूते पहनता है और जूते पहनते वक्त ‘बायां’ पैर पहले डालता है, मुझे तो पहले से पता था कि वामपंथी है. कितना बड़ा देशद्रोह है यह.
दूसरा स्तर-तो आलोचना बहुत हो ली. अब पता चल गया कि इतनी बातें उसमें हैं और मुझमें नहीं. हाय!यह जीवन व्यर्थ हो गया. कुछ भी करके उससे आगे निकलना होगा. उससे हर क्षेत्र में आगे निकलने की इच्छा बलवती हो जाती है.
आगे निकलने के लिए वह गुण खोजा जाएगा जिसमें विरोधी आपसे आगे हो. हिन्दू नफरतियों के लिए मुस्लिमों में वह गुण धर्मिक कट्टरता व कर्मकांड की पाबन्दी है. कट्टर हिन्दू इस बात से बहुत प्रभावित होता है कि जहाँ हिन्दू का मंदिर न जाना या जनेऊ न पहनना या देवी देवताओं, धार्मिक कर्मकांड आदि पर प्रश्न करना सामान्य घटनाएं हैं वहीं इस्लाम में नमाज छोड़ना, अल्लाह और नबी के बारे में शंका करना, ‘हराम’ वस्तुओं के प्रति सावधान न रहना आदि नाकाबिले बर्दाश्त गुनाह हैं.
‘कट्टर’ हिन्दू, जो अपने धर्म में इस ‘लकीर के फ़क़ीर’ वाली नियमावली को लागू करना आवश्यक समझता है उसको मुसलमानों की यह दीनी व्यवस्था ‘आदर्श’ लगती है. मुसलमानों से नफरत करने वाले कट्टर हिन्दू धीरे धीरे उनकी कट्टरता व कर्मकांड के प्रति दृढ़ता के प्रशंसक बन जाते हैं. कई हिन्दू मुझको कहते रहते हैं – “तुम हिन्दू होकर देवी देवताओं पर प्रश्न करते हो और तिलक जनेऊ आदि धारण नहीं करते हो और उनको देखो, कैसे नमाज़ व सुन्नत के पाबंद होते हैं. उनकी यह बात सीखने लायक है” आदि. जब आप किसी को ऐसा कहता सुनें तो समझ लें कि वह विरोधी भक्ति के दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है.
तीसरा चरण वह है जो राज ठाकरे, यति नरसिंहानन्द आदि के बयानों में दिखता है. जब समझदारी में आगे बढ़ने का स्कोप नहीं होता तो जाहिलियत में आगे बढ़ना ही एकमात्र उपाय है. वह बकरीद पर खून बहाते हैं, तो हम दीवाली पर सबको अस्थमा करेंगे. वह मस्जिद में अजान देते हैं तो हम उनके सामने जाकर हनुमान चालीसा पढ़ेंगे. वह सड़क पर नमाज पढ़ रहा है तो हम पार्क में जागरण करेंगे. सिर्फ अच्छी बातों में आगे होना काफी नहीं है, विरोधी को बुरी बातों में भी पछाड़ना मांगता. टोटल डोमिनेशन !
चौथे चरण में वह हमला कर देगा. Secret admirers become absolute haters. मरने – मारने की नौबत आ जाएगी.
पांचवे चरण में वह उनमें से एक हो जाएगा. मुस्लिम विरोधी हिन्दू इस्लाम क़ुबूल कर सकता है और हिन्दू विरोधी मुस्लिम घर वापसी कर सकता है.
एक तरफ बाबरी मस्जिद तोड़ने वाला बलबीर सिंह कलमा पढ़कर मोहम्मद आमिर हो जाता है और दूसरा वसीम रिज़वी घर वापसी करके जीतेन्द्र नारायण त्यागी बन बैठता है.
Mayank Sharma का लेख !
भक्ति तेरे रूप हज़ार….
यह लेख स्वतंत्र पत्रकार का है ये उनके अपने विचार हैं इससे वेबसाइट का सहमत व जिम्मेदार होना जरूरी नहीं है।

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