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पिछले नौ सालों में पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। सत्ता की दलाली करने वालों की बल्ले बल्ले हो रही है। अगर सरकार के हुजूर में सलामी न दी तो आप पर शासन प्रशासन का कहर झेलना पड़ता है। आज का आलम यह है कि सत्ता की गुलामी नहीं करने पर आप को सरकार और उसकी एजेंसियों की मार झेलनी पड़ सकती है। चाटुकारिता करने वाली गोदी मीडिया संस्थान और अघोषित पार्टी के कार्यकर्ताओं की मौज है। संस्थान को सरकार मुंह मांगा विज्ञापन मिल रहा कर्मचारियों की जेबें गर्म हो रही है। लेकिन जो पत्रकार सरकार की जी हुजूरी करने से मना करते हैं उन पर झूठे मुकदमें कर दिये जाते हैं। उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
न्यूज क्लिक पर सरकार का शिकंजा
सत्ताधारी पार्टी और सरकार ने अब खुलेआम ऐलान कर दिया है कि हमारी चाकरी करो या भुगतने को तैयार रहो।देश के बदलते राजनीतिक परिवेश में मोदी सरकार और भाजपा का विश्वास अब गोदी मीडिया से ऊब चुका है। वो समझने लगे हैं कि टीवी न्यूज पर जनता अब विश्वास नहीं कर रही है। इसलिये वो अब यूट्यूब के महत्व को जान गयी है। इसलिये जो यूट्यबर पैसा पकड़ कर पीआर करने को राजी हैं उन्हें साधा जा रहा है। जो लोग उनकी शर्तों पर राजी नहीं होते हैं उन्हें सत्ता के गुलाम पुलिस प्रशासन को पीछा लगा दिया जाता है। उन पर नकेल कसने की तैयारी शुरू कर दी गयी है। अब चूंकि मोदी सरकार को यह साफ नजर आ रहा कि उनकी सत्ता जाने को है। इसलिये वो उन मीडिया संस्थानों पर नकेल कसने की तैयारी कर रहे हैं जो उनकी सेवा टहल नहीं कर रहे हैं उनको शिनाख्त कर उन पर लगाम कसने की तैयारी शुरू हो गयी है। इसी कड़ी में न्यूज क्लिक वेब पोर्टल पर सरकार की नजरें टेढ़ी हो गयी हैं। दो माह पहले न्यूयार्क टाइम्स में छपी खबर को आधार मानकर इस संस्थान के मालिकानों पर शिकंजा कसा जा रहा है। खबर के अनुसार इस मीडिया संस्थान को चीनी कंपनियों ने फंडिंग की है। अगस्त में इस कंपनी के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया था। 3 अक्टूबर को इस कंपनी के लिये काम करने वाले आधा दर्जन से ज्यादा पत्रकारों के घरों पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दबिश डाली और कुछ पत्रकारों को हिरासत में लिया गया है। इसके साथ ही पुलिस ने उनके लैपटॉप और मोबाइल भी जब्त कर लिये हैं। हिरासत में लिये गये पत्रकारों में सीनियर पत्रकार उर्मिलेश, अभिसार शर्मा, अनिद्यो चक्रवर्ती, भाषा सिंह समेत अन्य कर्मचारियों को हिरासत में लेने की चर्चा है। यह पुलिसिया कार्रवाई इस बात का ऐलान है कि मोदी सरकार के खिलाफ खबरें छापी हैं तो उसका अंजाम भुगतने को तैयार हो जाओ।
यूट्यूबर और अन्य पत्रकारों को रखा निशाने पर
जैसा कि सब जानते हैं कि न्यूज क्लिक मीडिया संस्थान सत्ता विरोधी खोजी खबरें करने के लियेे जाना जाता है। इसी संस्थान ने अडानी समूह के खिलाफ कई खबरे छापी हैं जिससे अडानी और मोदी सरकार को तकलीफ हो रही थी। ये तो जग जाहिर है कि मोदी और अडाणी के रिश्तों को लेकर राहुल गांधी ने जब संसद में आवाज बुलंद की तो उनकी सांसदी चली गयी थी। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार अपनी खिलाफ जाने वाले लोगों को हर हाल में निपटाना चाहती है। यही हाल एनडीटीवी के रवीश कुमार के बारे में सरकार ने किया था। हालात ऐसे बना दिये कि अडाणी ने एनडीटीवी को ही खरीद लिया। लेकिन रवीश कुमार ने हिम्मत और धैर्य नहीं छोड़ा और आज उनकी पहचान देश में ही विदेश में भी बन गयी है। पत्रकारिता के आस्कर मैग्सेसे अवार्ड से भी नवाजा गया है। आज के समय में रवीश कुमार पत्रकारिता के शीर्ष पर हैं।
रवीश कुमार के अलावा पुण्य प्रसून बाजपेयी, दीपक शर्मा, अभिसार शर्मा, अनिंद्यो चक्रबर्ती, प्रज्ञा मिश्रा, समाचार भारत के ब्रजेश मिश्रा, अजित अंजुम, आशुतोष कुमार समेत अनेक पत्रकारों ने यूट्यूब पर अपना रुतबा कायम कर लिया है। जनता में इन लोगों का अच्छा खासा प्रभाव देखा जा रहा है। कुछ और भी आजाद पत्रकार हैं जो सरकार की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखते हैं वो खुलकर सरकार की आलोचना अपने चैनल पर करते हैं। इसका दुष्प्रभाव मोदी सरकार की इमेज पर भी पड़ता दिख रहा है। इसी सब से परेशान आरएसएस, मोदी सरकार और भाजपा उन यूट्यूबर पर फंदा कस रही है जो उनकी नीतियोंं की खुल कर निंदा कर रही है। आम जनता ने पत्रकार कप्पन सिद्दीक मामले को काफी करीब से देखा है जिसे यूपी की पुलिस ने सरकार के इशारे पर लगभग दो साल तक बिना किसी जुर्म के जेल में रखा। उसका जुर्म यह था कि वो मुस्लिम समुदाय से आता है। इसके अलावा यूपी सरकार और पुलिस अनेक पत्रकारों को सिर्फ इसलिये फर्जी मुकदमों में फंसाया जिन्होंने सरकार की खामियों को जनता के सामने लाने का साहस दिखाया उन्हें सरकारी जुल्म को सहना पड़ा।

पवन को मौत के मुंह में क्यों धकेला गया
यूपी के Mirzapaur के रहने वाले पत्रकार पवन जायसवाल का क्या कसूर था जो वहां के डीएम ने उनके खिलाफ मुकदमा दायर करवा कर जेल भेज दिया। उसका कुसूर सिर्फ इतना था कि उसने सरकारी स्कूल में हो रही मिड डे मील धांधली को उजागर किया था। सरकारी स्कूल और सरकार प्रबंधन ने इस मामले की जांच न करते हुए पत्रकार पवन जायसवाल को निशाना बनाते हुए उस पर गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करवा दिया। इसके बाद कई माह तक पत्रकार को जेल में उसे उस गुनाह की वो सजा काटनी पड़ी जो उसने किया ही नहीं था। अफसोस की बात तो यह है कि इससे पवन को उसके परिवार को जिल्लत सहनी पड़ी। पवन को अपमान के घूंट पीने पड़े। दुर्भाग्य की बात तो यह कि पवन को गंभीर जानलेवा बीमारी थी। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने उसकी बीमारी को नजर अंदाज करते हुए बेरहमी से सुलूक किया। अपनी रिहाई के कुछ दिनों बाद पवन की मौत हो गयी। उसकी मौत पर भी सरकार और प्रशासन ने कोई सहानुभूति नहीं जतायी। ये यूपी सरकार की बेरहमी का चेहरा सबके सामने आया है। मतलब साफ है कि सरकार के खिलाफ कोई भी आवाज बुलंद करता है तो उसे सरकार अपराध के रूप में मानकर ऐक्शन लेगी। अगर ऐसा है तो पत्रकार का काम ही क्या रह जायेगा। सरकार की भजन मंडली में शामिल हो कर सत्ता की गुलामी स्वीकार कर ले।








