#My Views# My bloggs# Memoories# Author page# LitratureNews# Storyteller# Lucknow Journalism# Special story on Gandhi Jayanti# Sabarmati Ashram# Mahatma Gandhi#
राष्ट्रपिता गांधी जी के बारे में एक बात जग जाहिर थी कि वो सत्य और अहिंसा के पुजारी थे। बहुत कम लोग जानते होंगे कि गांधी जी दूसरों को उपदेश देने से पहले वो उसे खुद पर भी लागू करते थे। उनकी अहिंसा, स्पष्टता और पक्का इरादा ही था कि उन्होंने अंग्रेजों को इस देश से बाहर करने में सफलता प्राप्त की। कुछ लोगों का कहना है कि देश की आजादी में महात्मा गांधी का कोई योगदान नहीं गथा। ये वो लोग हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिये कोई योगदान नहीं किया। बल्कि अंग्रेजों के साथ मिल कर गद्दारी की थी।
वही लोग हैं कि आज देश का इतिहास तोड़ने मरोड़ने में लगे है। लेकिन ये देश महात्मा गांधी का था है और गांधी का रहेगा। यहां गोडसे को कभी भी स्वीकार नहीं किया जायेगा। गोडसे ने गांधी की हत्या कर उनके शरीर को मार दिया लेकिन उनकी विचारधारी को कोई भी ताकत नहीं खत्म कर पायेगी। आपको मैं उस दृष्टांत को बताने जा रहा हूं जिस पर कोई राजनीति नहीं कर सकता है।
गांधी जी ने बच्चे से क्या कहा
बात उन दिनों की है जब देश आजाद हो चुका था। देश की कमान देश के पहले पीएम पंडित जवाहर लाल हाथों में थी। गांधी जी अपना अधिक समय गुजरात के साबरमती आश्रम में बिताया करते थे। सुबह पूजा अर्चना के बाद वो आश्रम में आये लोगों के दुख तकलीफों को सुनते और उनका समाधान करने का प्रयास करते थे। रविवार को आश्रम में भारी तादाद में दर्शनार्थी आते थे। एक दिन इतवार के दिन बापू आश्रम में लोगों की समस्याओं को सुन कर समाधान कर रहे थे। इसी बीच एक वृद्धा अपने पोते के साथ उनके पास आ कर बोली बापू आपसे अनुरोध है कि मेरी एक समस्या है जिसका समाधान केवल आप कर सकते हैं। बापू ने उसकी ओर गंभीरता से देखा।


वद्धा बोली— बापू ये मेरा पोता छह साल का है। खाना पीना तो सही करता है। प्ए़ने भी स्कूल जाता है। लेकिन ये गुड़ बहुत ज्यादा खाता है।
बापू ने सवालिया नजरों से वृद्धा को देखा और पूछा—आप मेरे से क्या चाहती हैं।
वृद्धा ने कहा कि — बापू आप की सब लोग बात मानते हैं आप इसे समझाइये तो जरूर मान जायेगा। क्यों कि आप की बात कोई भी नहीं टालता है।
बापू ने कहा— तुम कह रही हो तो मैं इसको जरूर समझाने की कोशिश करूंगा। ऐसा करो कि तुम दस दिनों के बाद इसे आश्रम में लाना तब मैं इसे समझाने की कोशिश करूंगा।
इतना सुन महिला संतुष्ट हो कर आश्रम से वापस अपने घर चली गयी। बापू भी दूसरे लोगों की समस्याओं को सुनकर समाधान करने लगे। बात आयी गयी हो गयी। लेकिन दस दिन कब बीत गये पता ही नहीं चला।
ठीक दस दिन वो बूढ़ी औरत अपने पोते के साथ आश्रम में आयी और सीधे बापू के पास जा कर खड़ी हो गयी। बापू ने उसकी मनोदशा समझते हुए उसकी ओर देखा।
वृद्धा ने हाथ जोड़ कर अनुरोध किया कि आपके पास मैं दस दिन पहले अपने पोते को लेकर आयी थी। आपने मुझे आज समाधान के लिये बुलाया था।
गांधी जी ने उसकी ओर गहनता से देखा। बापू ने कहा— याद आया मैंने तुम्हें बुलाया था। कहां है तुम्हारा पोता।
महिला ने पास खड़े अपने पोते को बापू के करीब भेज दिया। बापू ने उस बच्चे को अपने पास बुलाया और सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— बेटा तुम्हें गुड़ खाना अच्छा लगता है। बच्चे ने मासूमियत से हां में सिर हिला दिया।
बापू ने गंभीरता से कहा बेटा गुड़ ज्यादा खाना ठीक नहीं होता है। स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इतना कह कर बापू ने बच्चे को दादी के पास भेज दिया।
उधर दादी ने बापू को सवालिया नजरों से बापू की ओर ताका। उससे रहा नहीं गया तो उसने बापू से पूछ ही लिया कि आपने सिर्फ मेरे पोते से इतना ही कहा कि गुड़ ज्यादा खाना सेहत के लिये ठीक नहीं है। अगर इतना ही कहना था तो दस दिन पहले ही कह दिया होता। आज दोबारा तो नहीं आना पड़ता।
बापू ने मुस्कराते हुए कहा—आपने ठीक कहा कि आपको दोबारा आना पड़ा। लेकिन दस दिनों पहले तक मैं भी ज्यादा गुड़ खाया करता था। जब मैं ही ऐसा करता हू तो मैं किसी बच्चे से गुड़ खाने से मना कैसे कर सकता था। पिछले दस दिनों से मैंने गुड़ खाना छोड़ा तभी मैंने इस बच्चे को खाने से मना किया है। पहले अपने पर संयम रखना चाहिये तब किसी और को संयम रखने की बात करनी चाहिये। ऐसे थे हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी।








