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आज सुबह जब सूरज की पहली किरण के साथ एक दर्दनाक और हृदयविदारक खबर सबके सामने आयी। खबर के अनुसार राजस्थान के कोटा में मेडिकल और इंजनियरिंग की तैयारी करने वाले तीन बच्चों ने फांसी लगा कर जान दे दी जिसने भी यह न्यूज सुनी या देखी वो दुखी हो गया। कोटा के अलावा भरतपुर मेडिकल कालेज के अंतिम साल के छात्र ने भी अपने बाथरूम में फांसी लगा कर जान दे दी। इन दोनों घटनाओं को सुन कर लोगों के कलेजे मुंह को आ गये। हर कोई बस यही कह रहा है कि आखिरकार बच्चों पर किस बात का इतना दबाव है जो अपनी जान तक देने से नहीं चूक रहे हैं।
कॅरियर को लेकर घर का बेजा प्रेशर
आज के समय में बच्चों के कॅरियर को लेकर माता पिता इतने ज्यादा बेचैन रहते हैं कि वो किसी भी सूरत में अपने बच्चों में अपना सपना पूरा करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। उनके दबाव के साथ बच्चों पर पढ़ाई का प्रेशर भी होता है। खासतौर कंपीटेटिव स्टडी में। कोचिंग में पढ़ने वाले बच्चों में एक दूसरे से आगे निकलने या नंबर लाने की होड़ लगी रहती है। ऐसे में वो बच्चे जिनमे थोड़ा भी आत्म विश्वास कम होता है वो ये सोचते हैं कि अगर उनका सिलैक्शन किसी जगह नही हुआ तो जीने का उद्देश्य ही नहीं रहेगा। बस उसी आत्म ग्लानि में वो जान देने का निर्णय ले लेते हैं।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बच्चों की ही मानिसिकता ऐसी होती उनके मां—बाप भी ऐसा ही कुछ सोचते हैं बच्चा अगर डाक्टर या इंजीनियर नहीं बना तो बच्चे का जीवन अंधकार में हो जायेगा। वो जमाने गये जब बच्चों को सिर्फ डाक्टर या इंजीनियरिंग करना ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था। आज के समय में बच्चों के लिये बहुत सारे कॅरियर के रास्ते बन गये हैं जहां बच्चे अपना सुनहरा भविष्य चुन सकते हैं।
राजस्थान के कोटा में बहुत सारे कोचिंग इंस्टीट्यूट हैं जो मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराते हैं। पूरे देश से यहां बच्चे कंपीटीशन के लिये यहां पढ़ने आते हैं। यहां पर तैयारी कराने के नाम मोटी फीस भी वसूली जाती है। ताजा मामले में तीन युवा लड़के ने अपने अपने हास्टल के रूम के वाशरूम में फांसी लगा कर जान दे दी। न तो उन बच्चों के घर वाले इस खुदकुशी के बारे मों कोई जानकारी दे पा रहे हैं और न ही कोचिंग संस्थान इस मामले में जानकारी दे रहे हैं। ऐसा नहीं कोटा में यह पहली बार हुआ है इससे पहले भी कई बच्चों ने ऐसे ही जान दे कर अपनी जिंदगी समाप्त् कर ली है।
दुनिया सिर्फ डाक्टर या इंजीनियर तक ही नहीं सीमित
यह अनुमान लगाया जाता है कि बच्चों पर पढ़ाई का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है साथ घर वालों को भी अपने बच्चों से काफी उम्मीद रहती है। उन बच्चों को लगता है कि अगर उनका सिलैक्शन मेडिकल इंजीनियरिंग नहीं हुआ तो वो अपने घर वालों को क्या मुंह दिखायेंगे। वो ये मान बैठते हैं कि दुनिया में डाक्टर या इंजीनयर के अलावा कुछ भी नहीं है। बस इसी अवसाद में वो अपनी जान देने का निर्णय कर लेते हैं। सबसे पहले मां बाप को बच्चे से इतनी ज्यादा उम्मीद नहीं लगानी चाहिये जिससे वो अपनी पसंद की फील्ड न चुन सके। इस बात को भी बच्चे ध्यान रखें कि दुनिया सिर्फ डाक्टर या इंजीनियर तक ही नहीं सीमित है।








